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संपादकीय: कामयाबी के झंडे

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अब तक जो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है उसमें दिल्ली में 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेल हमारी उपलब्धियों के लिए मील का पत्थर थे। लेकिन इस बार आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बाद भारत तीसरे स्थान पर रहा।

Author April 17, 2018 4:56 AM
भारत की स्टार टेबल टेनिस खिलाड़ी मानिका बत्रा।

आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुए इक्कीसवें राष्ट्रमंडल खेलों में इस बार भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा। यह इस बात का संकेत है कि खेलों के विविध आयामों में हमारी प्रतिभाएं निखर रही हैं और कामयाबी के झंडे गाड़ रही हैं। इस बार राष्ट्रकुल खेलों में भारत पहले या दूसरे स्थान पर भले न रहा हो, लेकिन उपलब्धियां इस मायने में ज्यादा बड़ी हैं कि बैडमिंटन, मुक्केबाजी और टेबिल टेनिस जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने नए कीर्तिमान स्थापित किए। कई उपलब्धियां तो ऐसी हैं जो पहली बार भारत के खाते में दर्ज हुर्इं। टेबल टेनिस में मनिका बत्रा ने महिला एकल में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया। भाला फेंक (जेवलिन थ्रो) में भी नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीता। मुक्केबाजी में मैरीकॉम स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। पहलवानों पर नजर डालें तो सभी बारह पहलवान पदकों के साथ लौटे जिनमें पांच स्वर्ण, तीन रजत और चार कांस्य पदक शामिल हैं। सबसे ज्यादा सोलह पदक निशानेबाजी में मिले, जिनमें सात स्वर्ण हैं।

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राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने अब तक जो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है उसमें दिल्ली में 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेल हमारी उपलब्धियों के लिए मील का पत्थर थे। लेकिन इस बार आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बाद भारत तीसरे स्थान पर रहा। गोल्ड कोस्ट के इस भारी-भरकम खेल आयोजन में यों तो हर भारतीय की मेहनत रंग लाई, पर हरियाणा ने बाजी मारी। कुल छियासठ पदकों में से बाईस हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते। इनमें नौ स्वर्ण, सात रजत और छह कांस्य पदक हैं। इनमें भी दो स्वर्ण पदक सहित सात पदक महिलाओं ने जीते हैं। हरियाणा ने 2015 में जो नई खेल नीति बनाई थी और उस पर सही तरीके से अमल किया, इसे उसका नतीजा माना जाना चाहिए। ये खेल नए खिलाड़ियों के लिए भी भविष्य की मंजिल तय करने वाले हैं। अभ्यास के लिए कभी एक अदद भाले के लिए तरसने वाले नीरज चोपड़ा पुरुष भाला फेंक प्रतिस्पर्धा में स्वर्ण हासिल कर पहले भारतीय एथलीट बन गए। निशानेबाजी में पंद्रह साल के अनीश भानवाल और सोलह साल की मनु भाकर ने स्वर्ण पदक जीत कर भारतीय खेल जगत में धमाकेदार मौजूदगी दर्ज कराई।

पर हॉकी में भारत को निराशा हाथ लगी। पुरुष और महिला, दोनों टीमें खाली हाथ लौटीं। पावरलिफ्टिंग, स्क्वॉश और एथेलेटिक्स में भारत की स्थिति आशानुरूप नहीं रही। कुछ खेल हैं जिनमें हम उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उपलब्धियां बताती हैं कि हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है। बस जरूरत है तो प्रतिभाओं को खोज कर उन्हें बढ़ावा, बेहतरीन प्रशिक्षण और सुविधाएं मुहैया कराने की। देश में जो तवज्जो क्रिकेट जैसे खेल को दी जाती है वह और खेलों को नहीं मिलती। दूसरे खेलों के विकास में यह बड़ी बाधा है। खेलों की जिम्मेदारी संभालने वाले खेल संघों की हालत से कोई अनजान नहीं है। खेल के क्षेत्र में प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए खेल संघों को जो भूमिका निभानी चाहिए थी, वे उसमें पूरी तरह नाकाम साबित हुए और राजनीति के अड्डे बने रहे। अगर खेल संघ अपने मकसद के प्रति पूरे समर्पण के साथ काम करें और राजनीति के चंगुल से मुक्त हों तो भारत दुनिया में हर खेल में परचम लहरा सकता है!

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