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संपादकीयः संकट और एकजुटता

दरअसल, पूर्ण बंदी की घोषणा के बाद कई जगहों पर लोगों की लापरवाही और मनमानी देखी गई। सामाजिक दूरी बनाने की दरकार दरकिनार होती देखी गई। फिर हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों की तरफ लौटने लगे, जिससे दूर-दराज तक इस संक्रमण के फैलने की आशंका गहरी हो गई।

Author Published on: April 3, 2020 12:13 AM
पूर्ण बंदी की घोषणा के बाद कई जगहों पर लोगों की लापरवाही और मनमानी देखी गई।

कोरोना विषाणु के संक्रमण को फैलने से रोकने और संक्रमितों को समुचित उपचार उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की कोशिशें निस्संदेह सराहनीय हैं। समय रहते इस दिशा में पूर्ण बंदी जैसा कठोर कदम उठाया गया, जिस पर राजनीतिक स्वार्थों को परे रख कर सभी राज्य सरकारों ने सहयोग का रुख अख्तियार किया। उसी का नतीजा है कि दूसरे देशों की तुलना में हमारे यहां इस विषाणु का प्रकोप अधिक नहीं फैलने पाया है। स्वाभाविक ही राज्य सरकारों के इस सहयोगात्मक रुख की प्रधानमंत्री ने तारीफ की और एकजुट होकर काम करने के लिए उन्हें साधुवाद दिया। कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए की जा रही कोशिशों के दौरान यह दूसरा मौका था, जब प्रधानमंत्री सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मुखातिब थे। उन्होंने इस समस्या से पार पाने के लिए उठाए जा रहे कदमों पर मुख्यमंत्रियों से जानकारी हासिल की और उन्हें देश के सामने एक साझा लक्ष्य के तहत काम करने की अपील की। इसमें उन्होंने कोरोना संक्रमितों की पहचान करने, उन्हें अलग-थलग कर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया। पूर्ण बंदी के नौ दिन हो गए हैं, पर मामले अभी सामने आ रहे हैं, इसलिए प्रधानमंत्री की चिंता समझी जा सकती है।

दरअसल, पूर्ण बंदी की घोषणा के बाद कई जगहों पर लोगों की लापरवाही और मनमानी देखी गई। सामाजिक दूरी बनाने की दरकार दरकिनार होती देखी गई। फिर हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने घरों की तरफ लौटने लगे, जिससे दूर-दराज तक इस संक्रमण के फैलने की आशंका गहरी हो गई। हालांकि इनमें से बहुत सारे लोगों को जगह-जगह रोक लिया गया, पर फिर भी अनेक लोग अपने गांव पहुंच गए, जिससे संक्रमण का दायरा फैलने का भय बना हुआ है। फिर निजामुद्दीन के मरकज और दिल्ली की दूसरी मस्जिदों में बाहर से आकर बड़ी संख्या में ठहरे तबलीगी जमात के लोगों में से सैकड़ों के कोरोना संक्रमित पाए जाने, उनमें से लौट कर अपने घर गए कई लोगों के संक्रमण से मर जाने का खुलासा होने के बाद चिंता और गहरी हो गई है। इनमें से बहुत सारे लोग देश के विभिन्न हिस्सों में धर्म प्रचार के लिए गए थे। फिर जो लोग अपने घर वापस गए, उनके जरिए यह संक्रमण कितने लोगों तक पहुंचा होगा, इसकी पहचान करना अभी मुश्किल बना हुआ है। ऐसी लापरवाहियों और मनमानियों के चलते पैदा हो गए खतरे के मद्देनजर सरकारों से चौकसी की अपेक्षा बढ़ गई है। प्रधानमंत्री के संबोधन से मुख्यमंत्रियों को निस्संदेह बल मिला होगा।

यह अच्छी बात है कि इस संकट की घड़ी में सभी राज्य सरकारों ने एकजुटता दिखाते हुए अपने-अपने स्तर पर सक्रियता दिखाई और इस समस्या से पार पाने के लिए हर जरूरी कदम उठाए। प्रवासी मजदूरों के घर लौटने जैसी स्थिति में जरूर उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकार के बीच तालमेल न बन पाने के कारण कुछ अव्यवस्था हुई थी, पर ज्यादातर मामलों में सहयोग का ही रुख देखा जा रहा है। ऐसे मौकों पर राजनीतिक स्वार्थ के बजाय एकजुटता का प्रदर्शन बेहतरी के प्रति आश्वस्त करता है। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती कोरोना विषाणु को फैलने से रोकने की है, उस पर जितनी जल्दी काबू पाया जा सकेगा, उतनी ही जल्दी जिंदगी अपनी पटरी पर लौटेगी और रुके हुए कामकाज शुरू हो सकेंगे। अगली चुनौती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की होगी। यही एकजुटता बनी रही और समन्वित रणनीति बना कर आगे बढ़ने का संकल्प कायम रहा, तो उससे भी पार पाने का भरोसा बनता है।

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