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फर्जी मतदाता

मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने या उसमें संशोधन आदि का काम चुनाव आयोग के जिम्मे है। उम्मीद की जाती है कि वह इसे अधिकतम त्रुटिहीन बनाएगा। मगर दिल्ली में अगले महीने संभावित विधानसभा चुनावों के मद्देनजर तैयार मतदाता सूची पर जैसे आरोप लग रहे हैं, वह निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत […]

Author January 7, 2015 12:01 PM
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मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने या उसमें संशोधन आदि का काम चुनाव आयोग के जिम्मे है। उम्मीद की जाती है कि वह इसे अधिकतम त्रुटिहीन बनाएगा। मगर दिल्ली में अगले महीने संभावित विधानसभा चुनावों के मद्देनजर तैयार मतदाता सूची पर जैसे आरोप लग रहे हैं, वह निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इस मसले पर दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा किया और कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी तादाद में जिस तरह फर्जी मतदाता होने के आरोप सामने आ रहे हैं, उस पर आयोग ने क्या कार्रवाई की है। अदालत ने कहा कि ऐसी शिकायतें सामने आई हैं कि शहर में एक ही व्यक्ति के नाम से कई मतदाता पहचान-पत्र अलग-अलग पतों पर जारी हैं। अकेले मुंडका इलाके में इकतालीस हजार से ज्यादा फर्जी मतदाता पहचान-पत्र धारक होने की शिकायत है। हालांकि अदालत ने इस आरोप के आधार पर दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनाव पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, मगर आयोग से यह पूछा है कि वह चुनाव से पहले फर्जी वोटरों की पहचान किस तरह करेगा और उन्हें वोट डालने से कैसे रोकेगा। इस पर आयोग ने सफाई दी है कि अंतिम मतदाता सूची में सुधार कर दिए गए हैं। लेकिन जिस तरह खुद दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अभी तक की जांच में करीब अट्ठासी हजार ऐसे मतदाताओं के होने की बात कही जिनके नाम, पते और फोटो आपस में मेल खाते हैं, उससे पता चलता है कि समस्या कितनी गहरी है। इनमें से अड़सठ हजार को अनुपस्थित, स्थान बदलने और डुप्लीकेट की सूची में रख कर पचास हजार को नोटिस जारी किया गया है।

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अगर गड़बड़ी के आरोप सही हैं तो सबसे पहला सवाल यही है कि मतदाता पहचान-पत्र बनाने की प्रक्रिया में इतनी लापरवाही क्यों है कि एक विधानसभा क्षेत्र में इतनी बड़ी तादाद में लोग फर्जी मतदाता पहचान-पत्र बनवा लेते हैं। हालांकि आम नागरिकों में भी इतनी जागरूकता नहीं देखी जाती कि निवास बदलने के बाद पुरानी मतदाता सूची से अपना नाम हटवा लें। लेकिन इससे आंकड़ों में बहुत हेरफेर नहीं होना चाहिए। अगर बड़ी तादाद में ऐसा होने लगे तब संदेह की गुंजाइश बनती है। गौरतलब है कि दिल्ली में कांग्रेस और कुछ समय पहले आम आदमी पार्टी ने भी आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मतदाता सूची में व्यापक हेरफेर का आरोप लगाया था। इसमें दो राय नहीं कि सभी बालिग नागरिकों को चुनावों में मतदान का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन सच यह है कि अक्सर मतदाता सूची तैयार करने के क्रम में आने वाली खामियों के चलते कई जगहों पर बड़े पैमाने पर फर्जी वोट डालने की खबरें आती हैं तो कहीं बहुत-से लोग अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते। किसी नागरिक के मतदाता पहचान-पत्र पर नाम और फोटो में तालमेल नहीं होना सबसे आम शिकायत है। यह भी देखा गया है कि कुछ राजनीतिक दल अपने लोगों को फर्जी मतदाता पहचान-पत्र बनवाने को उकसाते हैं। मगर पिछले कुछ सालों में जिस तरह मतदाता सूची में गड़बड़ी का खुलासा हुआ है, उससे आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए स्वच्छ और निष्पक्ष मतदान अनिवार्य है और इसे सुनिश्चित करना अंतिम तौर पर चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है।

 

 

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