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संस्कृति पर पहरा

शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों के महत्तर पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर शुरू से अंगुलियां उठ रही हैं। तमाम बुद्धिजीवी लगातार विरोध जता रहे हैं। मगर सरकार पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा। पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान यानी एफटीआइआइ में अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की […]

Author June 17, 2015 5:52 PM

शैक्षणिक और सांस्कृतिक संस्थानों के महत्तर पदों पर राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर शुरू से अंगुलियां उठ रही हैं। तमाम बुद्धिजीवी लगातार विरोध जता रहे हैं। मगर सरकार पर इसका कोई असर होता नहीं दिख रहा। पुणे के भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान यानी एफटीआइआइ में अध्यक्ष पद पर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति इसका ताजा उदाहरण है। फिल्म और टेलीविजन की दुनिया में चौहान की कोई खास उपलब्धि नहीं है, सिवाय ‘महाभारत’ धारावाहिक में युधिष्ठिर की भूमिका निभाने के। वे कई सालों से भाजपा से संबद्ध हैं और पिछले आम चुनाव में उन्होंने पार्टी के लिए पंजाब में प्रचार भी किया था। शायद यही पहलू उनके चयन का निर्णायक आधार बना होगा।

सियासी कोण से दी गई तवज्जो एक और तथ्य से भी जाहिर है। संस्थान के नवनियुक्त आठ में से चार सदस्य भी भाजपा से संबद्ध हैं। अध्यक्ष और सदस्यों की ऐसी नियुक्ति तमाम बौद्धिकों और कलाकारों के साथ ही वहां के विद्यार्थियों को भी रास नहीं आई है। विरोध में संस्थान के विद्यार्थियों ने कक्षाओं का अनिश्चितकालीन बहिष्कार कर रखा है। उनके समर्थन में कोलकाता के सत्यजित राय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के विद्यार्थी भी आंदोलन पर उतर आए हैं। एफटीआइआइ में अध्यक्ष का पद पिछले एक साल से खाली था। वहां अनेक तरह की अव्यवस्था फैली हुई थी, जिसे लेकर समय-समय पर विद्यार्थी आंदोलन कर रहे थे। अगर सरकार को इस संस्थान की दशा सुधारने की चिंता होती तो वह किसी अनुभवी और संजीदा संस्कृतिकर्मी को इसकी जिम्मेदारी सौंपती। लेकिन गजेंद्र चौहान और चार सदस्यों की नियुक्ति से जाहिर है कि सरकार की मंशा संस्थान में फिल्म और टेलीविजन से संबंधित प्रशिक्षण के बेहतर संसाधन और सुविधाएं उपलब्ध कराने के बजाय उसे अपने राजनीतिक रंग में ढालने की है।

मोदी सरकार के एक साल की समीक्षा मुख्य रूप से आर्थिक मसलों पर केंद्रित रही। इस पर बहुत कम ध्यान दिया गया कि पिछले एक साल में कला और संस्कृति की संस्थाओं के साथ कैसा सलूक किया गया। इनकी स्वायत्तता की जमकर बेकद्री की गई। वहां अपने-अपने क्षेत्र के अनुभवी, प्रतिभावान और प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों, कलाकारों-संस्कृतिकर्मियों के बजाय भाजपा-संघ के प्रति निष्ठावान लोगों की नियुक्तियां की गर्इं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, ललित कला अकादेमी, राष्ट्रीय संग्रहालय आदि पर संघ के प्रतिबद्ध लोग काबिज हो गए हैं। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की पुस्तकों के प्रकाशन पर नजर रखने के लिए भी संघ के एक पुराने सदस्य को नियुक्त कर दिया गया है।

शैक्षणिक संस्थानों में ‘भारतीय संस्कृति की रक्षा’ के लिए भाजपा-शासित राज्यों में भी अभियान चल रहे हैं। मध्यप्रदेश में बहुत पहले से यह जारी है। हरियाणा में दीनानाथ बतरा की निगहबानी में शैक्षिक परिदृश्य बदलने का प्रयास हो रहा है। चाक्षुष माध्यमों से संबद्ध संस्थानों और संस्थाओं में केंद्रीय प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को बदल कर मनमानी शुरू हुई। फिर राष्ट्रीय बाल फिल्म सोसाइटी की सरपरस्ती मुकेश खन्ना को सौंपी गई, जिन्हें बच्चों के लिए काम का कोई खास अनुभव नहीं रहा है। संघ की विचारधारा थोपने के चक्कर में इस बुनियादी हकीकत की अनदेखी की जा रही है कि साहित्य, कलाओं और शिक्षा-संस्कृति से जुड़ी गतिविधियां निरंतर नवोन्मेषी होती हैं। वे देश-दुनिया की स्थितियों, घटनाओं, बदलावों से संवेदनात्मक खुराक लेती और मनुष्यता के हक में, बेहतरी के सपने रचती-बुनती हैं। प्रगतिशीलता और प्रतिरोध, सहिष्णुता और सौहार्द उनकी प्रकृति होती है। इसे कुंद करने के प्रयास आखिरकार संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट ही करेंगे।

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