ताज़ा खबर
 

संपादकीय: चीन से उम्मीद

भारत के दौरे पर आए चीन के रक्षा मंत्री ने भारत की रक्षा मंत्री से मुलाकात के दौरान जिन मुद्दों पर चर्चा की, उनमें आतंकवाद प्रमुख मुद्दा रहा। दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई और आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने को लेकर सहमति बनी।

Author August 25, 2018 1:30 AM
भारत के दौरे पर आए चीन के रक्षा मंत्री ने भारत की रक्षा मंत्री से मुलाकात के दौरान जिन मुद्दों पर चर्चा की, उनमें आतंकवाद प्रमुख मुद्दा रहा।(Express Photo: Amit Mehra)

आतंकवाद से मिलकर निपटने के लिए भारत और चीन के बीच जो सहमति बनी है, वह दोनों देशों के बीच भविष्य के रिश्तों के लिए अच्छा संकेत है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत ने चीन से हमेशा सहयोग की उम्मीद रखी है। लेकिन हकीकत यह है कि चीन आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान का ही साथ देता आया है। भारत कई सालों से पाकिस्तान के आतंक के त्रस्त है और सीमापार आतंकवाद झेल रहा है। बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिक और जवान पाकिस्तानी हमलों और गोलीबारी का शिकार हो चुके हैं। चीन यह सब अच्छी तरह जानता-समझता है और देख भी रहा है। लेकिन उसने कोई ऐसी पहल नहीं की जिससे यह आभास मिलता हो कि वह भारत को आतंकवाद से बचाना चाहता है, या इस समस्या से निपटने में उसकी मदद करना चाहता है। इसलिए अगर अब चीन की आंखें खुली हैं और वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देना चाहता है तो इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है!

भारत के दौरे पर आए चीन के रक्षा मंत्री ने भारत की रक्षा मंत्री से मुलाकात के दौरान जिन मुद्दों पर चर्चा की, उनमें आतंकवाद प्रमुख मुद्दा रहा। दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई और आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चा बनाने को लेकर सहमति बनी। हालांकि अभी यह तय होना है कि चीन भारत की क्या मदद करेगा और आतंकवाद से निपटने में किस हद तक भारत के साथ खड़ा होगा। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर भारत को लेकर चीन के मन में यह प्रेम अभी ही क्यों जागा? क्या इसके पीछे चीन की कोई और मंशा तो काम नहीं कर रही? कहीं ऐसा तो नहीं कि इस सहयोग की आड़ में चीन भारत से और कोई अपेक्षाएं पाल रहा हो, या यह भारत को किसी जाल में उलझाने की कोई चाल हो? मन में ये सारी आशंकाएं इसलिए पैदा होती हैं कि चीन शुरू से पाकिस्तान का गहरा दोस्त है। पाकिस्तान पर उसका वरदहस्त है। पाकिस्तान से उसके आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हैं। जबकि भारत के साथ विवादों को लेकर उसका लंबा इतिहास रहा है और भारत को इसके कटु अनुभव हुए हैं। सीमा विवाद किसी तार्किक समाधान तक नहीं पहुंचा है। पिछले साल डोकलाम विवाद ने एक और नया मोर्चा खोल दिया। भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ की खबरें आती ही रहती हैं। इन सबसे लगता है कि विवाद करते रहना चीन की पुरानी फितरत है और वह भारत को उलझाए रखना चाहता है।

पठानकोट हमले के बाद जब भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश ए मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को अतंरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की कोशिश की थी, तब चीन ने ही भारत के इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया था। सुरक्षा परिषद के पंद्रह सदस्य देशों में चीन ही अकेला सदस्य देश था जिसने भारत की इस मांग को ठुकरा दिया था। चीन के इस कदम को पाकिस्तान का साथ देना नहीं कहा जाए तो और क्या माना जाना चाहिए? जबकि पूरी दुनिया मान रही है कि पाकिस्तान आतंकवाद का सबसे बड़ा अड्डा है। क्या चीन को यह पता नहीं है कि पाकिस्तान किस तरह से अपने यहां आतंकी सरगनाओं को पाल-पोस रहा है और उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ जंग छेड़ने में करता आ रहा है? इसलिए आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ मिल कर लड़ने के चीन के प्रस्ताव पर यह संशय पैदा होना स्वाभाविक है कि चीन आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का क्या साथ देगा!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App