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किसका इम्तहान

हरियाणा की गिनती बेहतर आर्थिक स्थिति वाले राज्यों में होती रही है। लेकिन किसी राज्य की प्रगति का ठीक आकलन करना हो, तो वहां की शैक्षिक हालत पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, क्योंकि यह सवाल भावी पीढ़ी के क्षमता-निर्माण से ताल्लुक रखता है। हरियाणा में पढ़ाई-लिखाई का आलम कैसा है इसका एक अंदाजा […]

हरियाणा की गिनती बेहतर आर्थिक स्थिति वाले राज्यों में होती रही है। लेकिन किसी राज्य की प्रगति का ठीक आकलन करना हो, तो वहां की शैक्षिक हालत पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, क्योंकि यह सवाल भावी पीढ़ी के क्षमता-निर्माण से ताल्लुक रखता है। हरियाणा में पढ़ाई-लिखाई का आलम कैसा है इसका एक अंदाजा दसवीं कक्षा के परीक्षा-परिणामों से लगाया जा सकता है। वहां इकसठ स्कूलों के दसवीं कक्षा के सभी विद्यार्थी फेल हो गए और करीब सौ स्कूलों में महज एक-एक बच्चा पास हो सका। कुल परीक्षा परिणाम केवल छियालीस फीसद रहा।

जाहिर है, आधे से ज्यादा विद्यार्थी फिर उसी कक्षा में होंगे। पर दसवीं कक्षा में बढ़ी हुई भीड़ से उत्पन्न होने वाली समस्या का प्रबंधकीय हल निकालने से बड़ा सवाल पढ़ाई-लिखाई का स्तर सुधारने का है। जहां पचास फीसद से ज्यादा बच्चे फेल हो जाएं, वहां पढ़ाई-लिखाई में उनके कमजोर होने का तर्क नहीं दिया जा सकता। दरअसल, यह इम्तहान बच्चों से अधिक राज्य की शिक्षा-व्यवस्था का था। दो साल पहले भी बोर्ड के तहत इकतालीस स्कूलों के दसवीं की परीक्षा के नतीजे शून्य रहे थे। लेकिन सरकार ने पढ़ाई-लिखाई की स्थिति में सुधार लाने के बजाय हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड पर पास होने वाले बच्चों का प्रतिशत बढ़ाने की जिम्मेवारी डाल दी थी। समस्या का हल यह खोजा गया कि बोर्ड परीक्षा के केंद्र दूसरे स्कूलों के बजाय परीक्षार्थियों के अपने-अपने स्कूल में ही रखे गए। इससे 2014 में नतीजों में मामूली सुधार तो हुआ, लेकिन इस बार जब फिर से दूसरे स्कूलों को केंद्र बना कर परीक्षाएं ली गर्इं तो नतीजे और खराब आए। परीक्षार्थियों के अपने-अपने स्कूल में परीक्षा-केंद्र बनाने पर नतीजे अच्छे इसलिए आए होंगे कि वहां नकल करने की छूट मिली होगी! क्या हरियाणा सरकार इसी रास्ते से शैक्षिक सुधार करना चाहती है?

हरियाणा में हालत यह है कि शिक्षा महकमे में आज भी हजारों पद खाली हैं। सरकार को इस बात की फिक्र नहीं है कि राज्य के सरकारी स्कूलों में पांचवीं कक्षा के पचास फीसद से ज्यादा बच्चे क्यों ठीक से वर्णमाला भी नहीं पढ़ना जानते, क्यों करीब सत्तर फीसद बच्चे गणित के साधारण सवाल हल नहीं कर पाते! राज्य में बड़े पैमाने पर ऐसे स्कूल हैं जहां दसवीं कक्षा तक पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं हैं। जो शिक्षक हैं भी, उनमें से बहुतों के बारे में यह शिकायत है कि उन्हें वक्त पर स्कूल में हाजिर होने या बच्चों की पढ़ाई के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है। पिछले साल शिक्षकों की लेट-लतीफी पर काबू पाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर राज्य के स्कूलों में बायोमैट्रिक मशीनें लगाई गर्इं।

लेकिन करीब छह महीने पहले सूचनाधिकार कानून के तहत मांगी गई एक जानकारी में हरियाणा के शिक्षा विभाग ने बताया कि राज्य के स्कूलों में लगी अस्सी फीसद से ज्यादा बायोमैट्रिक मशीनें खराब हैं या फिर चोरी हो चुकी हैं। यह तब है जब सरकारी स्कूलों के शिक्षक निजी स्कूलों के मुकाबले आकर्षक वेतन और तमाम सुविधाएं हासिल करते हैं। इस हालत में सुधार के लिए सख्त कदम उठाने के बजाय सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दिया और सरकारी स्कूलों की दशा खराब होने दी। हरियाणा की मौजूदा सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में सबसे खास कदम यह उठाया कि दीनानाथ बतरा को राज्य का शैक्षिक मार्गदर्शक बना दिया, जिनकी दिलचस्पी किसी और बात में नहीं, शिक्षा के भगवाकरण में है। क्या खट््टर सरकार को अब भी यह अहसास हो पाया होगा कि राज्य में असल शैक्षिक मसले क्या हैं।

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