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कलह में पार्टी

आम आदमी पार्टी में बगावत के सुर शांत नहीं हो रहे। जब-तब उसके कार्यकर्ताओं का रोष सतह पर उभर आता है। पार्टी कार्यकर्ताओं के क्षोभ की वजहें छिपी नहीं हैं, पर इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल..

Author नई दिल्ली | August 31, 2015 2:45 PM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

आम आदमी पार्टी में बगावत के सुर शांत नहीं हो रहे। जब-तब उसके कार्यकर्ताओं का रोष सतह पर उभर आता है। पार्टी कार्यकर्ताओं के क्षोभ की वजहें छिपी नहीं हैं, पर इसके संयोजक अरविंद केजरीवाल और राष्ट्रीय कायर्कारिणी के नेताओं को शायद उन कारणों पर ध्यान देना जरूरी नहीं जान पड़ता। उन्हें लगता है कि विरोध का स्वर उठाने वाले कार्यकर्ताओं को निलंबित कर पार्टी में अनुशासन और सिद्धांतों की रक्षा की जा सकती है। इसका ताजा उदाहरण पंजाब से पार्टी के दो सांसदों- धर्मवीर गांधी और हरिंदर खालसा को निलंबित किया जाना है।

संसद में आम आदमी पार्टी के चार सांसद हैं, उनमें से आधे की सदस्यता खत्म होने का रास्ता तैयार हो गया है। इस कदम से पार्टी की स्थिति पर क्या असर पड़ेगा, इस पर भी विचार करने की जरूरत नहीं समझी गई। पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत बनाने में जुटी है। इसी के मद्देनजर अमृतसर में कार्यकर्ताओं की रैली आयोजित की गई थी। मगर इस रैली में शिरकत करने के बजाय धर्मवीर गांधी और हरिंदर खालसा ने असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की समांतर रैली आयोजित की। उसमें अरविंद केजरीवाल की खुल कर आलोचना की गई। निलंबित नेताओं का आरोप है कि राज्य इकाई के पदाधिकारियों के सुझावों को नजरअंदाज कर पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व हमेशा अपना फैसला थोपता रहा है। मगर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का कहना है कि ये दोनों नेता काफी समय से योगेंद्र यादव से निकटता बनाए हुए और पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल थे।

पार्टी विरोधी गतिविधियों पर किसी भी सदस्य के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को शायद ही कोई अनुचित कहे। पर किसी पार्टी में लगातार विरोध के सुर उभरने लगें तो उसके केंद्रीय नेतृत्व को भी आत्ममंथन करने की जरूरत होती है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय ही कुछ संदिग्ध चरित्र वाले लोगों को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में मतभेद उभर आए थे। फिर चुनाव के बाद पार्टी में नेतृत्व और सैद्धांतिक पहलुओं को लेकर ये मतभेद तीखे हो गए थे। अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद पार्टी नियमों के मुताबिक संयोजक का पद किसी और सदस्य को सौंपने की बात उठी, तो अरविंद केजरीवाल राजी नहीं हुए। फिर दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार को लेकर भी उनका रुख नकारात्मक बना रहा। यह टकराव इस कदर बढ़ा कि अरविंद केजरीवाल ने प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव जैसे पार्टी के संस्थापक सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।

पार्टी के आंतरिक लोकपाल की बात सुनना तो दूर, उन्हें भी हटा दिया गया। फिर आज तक आंतरिक लोकपाल की जगह खाली है। लगातार अरविंद केजरीवाल का रवैया एकाधिकारवादी नेता का नजर आता रहा है। कई ऐसे मौके आए जब उनके कामकाज के तरीके में सुधार और पार्टी सिद्धांतों को मजबूत बनाने की जरूरत रेखांकित की गई, पर उन्होंने वे मौके जानबूझ कर गंवाए। ऐसे में पार्टी के भीतर सामंजस्य की स्थिति कभी बन ही नहीं पाई। इस तरह आम आदमी पार्टी अपना वैकल्पिक राजनीति का संकल्प कहां तक पूरा कर पाएगी।

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