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बर्बरता की सड़क

नगालैंड के दीमापुर शहर में जिस तरह भीड़ ने बलात्कार के एक संदिग्ध आरोपी को पीट-पीट कर मार डाला, वह कई कारणों से बेहद चिंताजनक मामला है। यह घटना हमारे समाज में बढ़ रही नासमझी और संवेदनहीनता की ओर इंगित करती है, जो कई बार बर्बरता की शक्ल ले लेती है। लेकिन दीमापुर के इस […]

नगालैंड के दीमापुर शहर में जिस तरह भीड़ ने बलात्कार के एक संदिग्ध आरोपी को पीट-पीट कर मार डाला, वह कई कारणों से बेहद चिंताजनक मामला है। यह घटना हमारे समाज में बढ़ रही नासमझी और संवेदनहीनता की ओर इंगित करती है, जो कई बार बर्बरता की शक्ल ले लेती है। लेकिन दीमापुर के इस मामले में जिस तरह कई नगा उग्रवादी संगठनों की संलिप्तता सामने आई है और जिस तरह सारे मामले ने देखते-देखते सांप्रदायिक और दो राज्यों के बीच तनाव का रूप ले लिया, उसे देखते हुए यह वाकया सुनियोजित भी हो सकता है।

सैयद फरीद खान पर एक महिला से बलात्कार का आरोप था। इसलिए कई लोगों ने भीड़ के कृत्य को कानून हाथ में लेना कहा है। पर जहां आरोप की जांच बाकी हो, इस तरह का मुहावरा इस्तेमाल करना सही नहीं होगा। खान को गिरफ्तार हुए महज दस दिन हुए थे। उन्मादी भीड़ जबर्दस्ती केंद्रीय कारागार में घुस गई और उसे बाहर निकाल ले गई। फिर उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। भीड़ में शामिल कइयों ने मोबाइल फोन पर इस हत्या की वीडियो रिकार्डिंग भी की। मृतक के बारे में प्रचारित किया गया कि वह बांग्लादेशी घुसपैठिया था। और इस बात को हवा देते हुए दीमापुर में एक समुदाय-विशेष के घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया। मृतक के बांग्लादेशी होने का प्रचार गलत साबित हुआ है। खबर है कि उसके पिता सेना की नौकरी में थे, दो भाई भी, जिनमें से एक करगिल की लड़ाई में शहीद हो गया। बेशक इस पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही खान पर लगे आरोप को रफा-दफा नहीं किया जा सकता, मगर हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि उस पर लगे आरोप का निपटारा विधिवत कानूनी प्रक्रिया से हो। भीड़ को जज होने का हक नहीं है। मगर यह भीड़ जज ही नहीं, जल्लाद भी बन गई। उसे पुलिस क्यों नहीं रोक पाई?

पुलिस की दलील है कि जेल पर धावा बोलने वाले हजारों की संख्या में थे, इसलिए वह कुछ नहीं कर सकी। पर पुलिस अधिकारी तभी अतिरिक्त बल मंगाने के लिए तत्पर क्यों नहीं हुए, जब भीड़ बढ़ने लगी थी और उसके तेवर भी साफ दिख रहे थे? घटना की वीडियो रिकार्डिंग के आधार पर दोषियों को पहचानना और पकड़ना मुश्किल नहीं, बशर्ते नगालैंड सरकार इसकी दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाए। कई नगा संगठन इस सारे मामले को उनके राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ जन-आक्रोश से जोड़ कर दिखाना चाह रहे हैं। वैसे राजनीतिक समूह भी, जो असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में बांग्लादेशी बनाम मूल स्थानीय का विवाद खड़ा करना चाहते हैं, उसी तरह के बयान दे रहे हैं। लेकिन अगर इस तरह बर्बरता का बचाव किया जाएगा, तो जाति-संप्रदाय और स्थानीय बनाम बाहरी की लकीर पर हिंसा का कोई अंत नहीं होगा। इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश तो हुई ही, दो पड़ोसी राज्यों के बीच भी तनाव पैदा हुआ है। जहां असम से आकर बहुत-से लोग नगालैंड में रहते और काम करते हैं, वहीं असम में भी कई नगा बहुल इलाके हैं। अगर किसी आरोप पर प्रतिक्रिया वैसी होगी, जैसी दीमापुर में हुई, तो कोई भी जगह किसी भी समुदाय के लिए असुरक्षित ही रहेगी। इसलिए इस मामले में हमलावरों के खिलाफ तत्परता से कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि ऐसे तत्त्वों को सबक मिले, जो भीड़ की आड़ में बचने के इरादे से अपराध को अंजाम देते हैं।

 

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