ताज़ा खबर
 

एक और सपना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का शुभारंभ कर आम लोगों की रोजमर्रा की दुश्वारियां दूर करने का नया सपना दिखाया है। इस कार्यक्रम के जरिए देश भर में इंटरनेट सेवाओं का विस्तार होगा। उम्मीद जगी है कि लोगों को अस्पतालों में भीड़भाड़, तमाम दफ्तरों में भागदौड़, अधिकारियों से संपर्क करने आदि में आने […]

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का शुभारंभ कर आम लोगों की रोजमर्रा की दुश्वारियां दूर करने का नया सपना दिखाया है। इस कार्यक्रम के जरिए देश भर में इंटरनेट सेवाओं का विस्तार होगा। उम्मीद जगी है कि लोगों को अस्पतालों में भीड़भाड़, तमाम दफ्तरों में भागदौड़, अधिकारियों से संपर्क करने आदि में आने वाली मुश्किलों से निजात मिलेगी। स्कूली बच्चों को बेवजह पुस्तकों के बोझ तले नहीं दबना पड़ेगा। वे मोबाइल, लैपटॉप, टैब वगैरह के जरिए पढ़ाई कर सकेंगे।

शिक्षा के क्षेत्र में काफी सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी। लोग अपने जरूरी दस्तावेज डिजिटल रूप में संभाल कर रख सकेंगे। सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान होगा। सरकार का दावा है कि इससे प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता आएगी, प्रशासन और लोगों के बीच की दूरी मिटेगी। इस कार्यक्रम से जुड़ी योजनाओं के जरिए भारी निवेश का भी अनुमान है। रिलायंस, टाटा, विप्रो आदि सूचना तकनीक के क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों ने अपने भारी निवेश की घोषणा भी कर दी है। इन कंपनियों का दावा है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम से बड़ी संख्या में युवकों के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। दरअसल, आज जिस तेजी से मोबाइल फोन, कंप्यूटर और इंटरनेट उपभोक्ताओं की तादाद बढ़ रही है, इंटरनेट के जरिए कारोबार को काफी गति मिली है, उसे देखते हुए संचार सेवाओं के विस्तार और उनकी गुणवत्ता में बेहतरी लाने का दबाव काफी समय से बना हुआ था। शहरी इलाकों में इन सुविधाओं की पहुंच फिर भी तेजी से हो रही है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में इसका विस्तार अपेक्षित गति से नहीं हो पा रहा। इसी के मद्देनजर सरकार ने डिजिटल इंडिया कार्यक्रम की शुरुआत की है।

मगर इस कार्यक्रम में कुछ बुनियादी समस्याओं और आशंकाओं को दूर करने के उपाय नजर नहीं आते। इंटरनेट की दुनिया में सूचनाओं, कारोबारी गतिविधियों आदि की संवाहक तमाम कंपनियां विदेशी हैं। इनमें अमेरिकी कंपनियों का आधिपत्य है। गूगल, याहू, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट, स्काइप, एप्पल आदि के सहारे ही भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता जुड़े हुए हैं। ऐसे में भारत में डिजिटल गतिविधियों से सबसे अधिक उन्हीं को मुनाफा मिलेगा। फिर इन कंपनियों पर अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी के साथ राष्ट्रीय महत्त्व की सामरिक जानकारियां साझा करने का खुलासा हो चुका है। सूचनाओं के आदान-प्रदान और तमाम कारोबारी गतिविधियों पर इन कंपनियों की नजर रहती है। इसलिए डिजिटल भारत बनाने से पहले सुरक्षात्मक पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। इंटरनेट सेवाओं की संवाहक कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने और किसी गड़बड़ी की स्थिति में उन पर जुर्माने, दंड आदि के भी कानूनी प्रावधान होने चाहिए।

हमारे यहां साइबर अपराध से जुड़े कानून जरूर हैं, पर कंपनियों की मनमानी से निपटने के लिए कोई भरोसेमंद प्रावधान नजर नहीं आता। फिर ग्राम पंचायतों को ब्राडबैंड से जोड़ना उसी तरह है जैसे कुछ दिनों पहले किसान चैनल शुरू करके खेती-किसानी की दशा सुधारने की उम्मीद जगाई गई थी। गांवों में आज भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती। बहुत सारे लोग कंप्यूटर और इंटरनेट सुविधाओं का संचालन नहीं जानते। भले सरकार ने इसके लिए व्यापक प्रशिक्षण अभियान चलाने का तय किया है, पर इससे गांव के लोगों को अस्पतालों की भीड़, बैंकों की कतार, पटवारी की खुशामद, बाजार के वर्चस्व, रेलों की रेलमपेल आदि से कितनी निजात मिल पाएगी, कहना मुश्किल है। भले डिजिटल इंडिया के जरिए प्रशासन और लोगों के बीच की दूरी कम करने का दावा किया जा रहा है, पर इससे प्रशासन के कामकाज के तरीके में बदलाव का भरोसा नहीं जगाया जा सकता। सपनीले कार्यक्रमों की झड़ी लगाने से ज्यादा जरूरी है कि देश की बुनियादी जरूरतों और समस्याओं का गंभीरता से अध्ययन करके व्यावहारिक योजनाओं को चलाने का प्रयास हो।

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta

Next Stories
1 जेल में सुरंग
2 यूनान का दुश्चक्र
3 गरीबी का दायरा
ये  पढ़ा क्या?
X