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डेंगू की धमक

पिछले कुछ सालों से दिल्ली में बरसात शुरू होने के साथ डेंगू की समस्या खड़ी हो जाती है। इससे निपटने के लिए किए गए सरकारी उपायों और जन-जागरूकता अभियानों के बावजूद डेंगू के मामले रोके नहीं जा पाते। इस साल सिर्फ पिछले एक हफ्ते के दौरान जिस तरह डेंगू के छह और मच्छरजनित बीमारियों के […]

Author July 23, 2015 13:54 pm

पिछले कुछ सालों से दिल्ली में बरसात शुरू होने के साथ डेंगू की समस्या खड़ी हो जाती है। इससे निपटने के लिए किए गए सरकारी उपायों और जन-जागरूकता अभियानों के बावजूद डेंगू के मामले रोके नहीं जा पाते। इस साल सिर्फ पिछले एक हफ्ते के दौरान जिस तरह डेंगू के छह और मच्छरजनित बीमारियों के उनतीस मामले सामने आ चुके हैं, उससे यही पता चलता है कि बीते कई सालों के कड़वे अनुभव के बाद भी सरकार ने क्या सबक सीखा है। यह हालत तब है जब अभी बरसात का मौसम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जबकि बरसात के बाद भी कुछ महीने इस बीमारी के लिहाज से काफी संवेदनशील और खतरनाक होते हैं।

जाहिर है, अभी की हालत देखते हुए मच्छरों की रोकथाम के ठोस उपाय नहीं किए गए तो आने वाले महीनों में डेंगू का खतरा बढ़ सकता है। सवाल है कि अगर केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी बैठकें करके अस्पतालों में डेंगू से निपटने की तैयारियों का जायजा ले रहे हैं तो क्या यह इस बीमारी की रोकथाम के लिए काफी है? किसी बीमारी के खतरे को कम करने का सबसे कारगर उपाय उसके पनपने की गुंजाइशों को खत्म या कम किया जा सके। लेकिन सच यह है कि अभी तक स्थिति पर नियंत्रण के लिए कुछ भी खास नहीं किया गया है।

बचाव के इंतजाम इसी से समझे जा सकते हैं कि दिल्ली नगर निगम की ओर से चलाए गए जांच अभियान में इसके कार्यक्षेत्र के केवल दक्षिणी इलाके में चौंतीस हजार से ज्यादा घरों में मच्छरों के फैलने का खतरा पाया गया। दूसरे इलाकों की हालत भी इससे बहुत अलग नहीं है। करोड़ों रुपए खर्च करके अपनी उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करने में लगी केंद्र या राज्य सरकार को डेंगू की वजह बनने वाले मच्छरों के पनपने से बचाव और रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान चलाना जरूरी नहीं लगता।

विशेषज्ञों का मानना है कि मच्छरजनित रोगों में डेंगू दुनिया भर में सबसे ज्यादा तेजी से फैलने वाली बीमारी है। इससे बचाव ही इसके खतरे को कम करने का सबसे कारगर उपाय है। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दिल्ली में डेंगू ने जो शक्ल अख्तियार कर ली है, उसे केवल एक खतरनाक बीमारी के बेलगाम हो जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उन तमाम संबंधित सरकारी महकमों की काहिली और गैरजिम्मेदार रवैए को भी दर्शाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि हर साल जब तक डेंगू से लोग मरने नहीं लगते और समस्या गंभीर नहीं हो जाती, तब तक सरकार की नींद नहीं खुलती?

जबकि पिछले कुछ सालों का अनुभव बताता है कि डेंगू खतरनाक जरूर है, लेकिन यह तभी जानलेवा स्तर तक पहुंचता है, जब एहतियाती उपायों के प्रति लोग और सरकार दोनों लापरवाही बरतते हैं। इस बीमारी के लिए जिम्मेदार एडीज मच्छरों के पलने-बढ़ने की स्थितियों के खिलाफ अभियान और बचाव के इंतजाम से इस रोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इस समस्या पर काबू पाने के लिए सरकार की सक्रियता जितनी जरूरी है, उतनी ही जन-सहभागिता भी। पर इन दोनों मोर्चों पर हकीकत क्या है, यह छिपा नहीं है। विचित्र यह भी है कि साफ-सफाई के लिए आधुनिक तकनीकी उपायों के होने के बावजूद आज भी जिस तरह पुराने तरीके अपनाए जाते हैं, वह किसी बीमारी की रोकथाम के उपायों को कमजोर बनाता है।

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