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लापरवाही के गड्ढे

सड़क किनारे या फिर पार्कों में गड्ढे, खुले मैनहोल या नाले में गिर कर बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आती रही हैं। लेकिन ऐसे हादसों के सिलसिले के बावजूद सरकारें शायद इसे कोई गंभीर समस्या नहीं मानतीं। अगर गड्ढे या मैनहोल में गिर कर किसी की जान चली जाती है तो उसे एक सामान्य […]

Author June 9, 2015 5:54 PM

सड़क किनारे या फिर पार्कों में गड्ढे, खुले मैनहोल या नाले में गिर कर बच्चों की मौत की घटनाएं सामने आती रही हैं। लेकिन ऐसे हादसों के सिलसिले के बावजूद सरकारें शायद इसे कोई गंभीर समस्या नहीं मानतीं। अगर गड्ढे या मैनहोल में गिर कर किसी की जान चली जाती है तो उसे एक सामान्य दुर्घटना की तरह देखा जाता है, जबकि यह संबंधित महकमे के कर्मचारियों-अधिकारियों की अपनी ड्यूटी में लापरवाही की वजह से दूसरों की जान जाने का मामला है। इसमें अब तक जवाबदेही तय करने से सरकारें बचती रही हैं। लेकिन लगभग डेढ़ महीने पहले गड््ढे में गिरने से हुई नौ साल के एक बच्चे की मौत पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कई सरकारी विभागों को नोटिस जारी कर एक सख्त संदेश दिया है। इस मामले में दायर याचिका में दिल्ली सरकार, उत्तरी दिल्ली नगर निगम, दिल्ली औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम, दिल्ली पुलिस और अग्निशमन विभाग को दिल्ली के बादली इलाके में एक पार्क के नीचे बने जलाशय के ढक्कन को खुला छोड़ने और लापरवाही बरतने के लिए जिम्मेवार ठहराया गया है। याचिका में मांग की गई है कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की जाए और बच्चे की मौत के एवज में उसके परिवार को एक करोड़ रुपए मुआवजा दिया जाए।

इसे आपराधिक लापरवाही ही कहा जाएगा कि पार्क के बारह मैनहोल में से महज तीन ढके हुए थे और बाकी खुले छोड़ दिए गए थे। यह हैरानी की बात नहीं है कि बच्चा खेलते हुए धोखे से एक मैनहोल से नीचे गिर गया और आखिर उसकी जान चली गई। सवाल है कि जिस पार्क में लोगों और खासतौर पर बच्चों का जमावड़ा होता हो, वहां बिना किसी निगरानी और सावधानी के संकेतक लगाए इतने मैनहोल खुले होने का जिम्मेवार कौन है? यही नहीं, अचानक किसी हादसे की हालत में बचाव के इंतजाम का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मौके पर फायर ब्रिगेड ने जब पानी निकालने के लिए जलाशय में पम्प डाला तो वह काम नहीं कर रहा था। जाहिर है, संबंधित सरकारी महकमों की लापरवाही और संवेदनहीनता जानलेवा साबित हो रही है।

गड्ढों, जलाशयों या खुले नालों के अलावा सीवर लाइनों की सफाई के लिए मैनहोल के ढक्कन हटाने के बाद कई दिनों तक उन्हें किनारे पड़े रहने दिया जाता है। रात के अंधेरे या दिन में भी जरा-सी चूक होने पर किसी राहगीर के उनमें गिरने की आशंका बनी रहती है। हालत यह है कि खुले नालों या मैनहोल जैसे खतरनाक स्थानों के आसपास घेरा बनाना और रोशनी की व्यवस्था करना तो दूर, कोई निशान या संकेतक तक नहीं लगाए जाते, ताकि व्यक्ति उन्हें देख कर थोड़ी सावधानी बरते। ऐसे हादसों के मद््देनजर अदालतों की ओर से कई बार निर्देश जारी हो चुके हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर सरकार, नगर निगम या संबंधित महकमे को ही इस समस्या पर काबू पाना है, जिसकी हकीकत छिपी नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि ऐसी जगहें लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं। जब तक संबंधित महकमों के अधिकारियों को इसके लिए सीधे जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस समस्या से पार पाना मुश्किल बना रहेगा।

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