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संपादकीयः विवाद के सबक

कह सकते हैं कि चार छात्रों का निलंबन वापस लेकर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने भूल सुधार की कोशिश की है।

Author January 23, 2016 1:45 AM
रोहित वेमुला की आत्‍महत्‍या पर सभी थम नहीं रहे हैं राजनीतिक दलों के बयान।

कह सकते हैं कि चार छात्रों का निलंबन वापस लेकर हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने भूल सुधार की कोशिश की है। पर यह निर्णय हालात और माहौल के दबाव का नतीजा अधिक मालूम पड़ता है। रोहित वेमुला की खुदकुशी की देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। तमाम शैक्षिक संस्थाओं और बहुत-से शहरों में विरोध-प्रदर्शन हुए हैं। दलित और वामपंथी छात्र संगठन इसमें सबसे ज्यादा सक्रिय रहे हैं।

निशाने पर खासकर हैं केंद्रीय श्रममंत्री बंडारू दत्तात्रेय और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। अपने दो केंद्रीय मंत्रियों की हो रही फजीहत ने भाजपा को सांसत में डाल रखा है। यहां तक कि पार्टी के भीतर दलित नेताओं में भी बेचैनी है औरसहयोगी दलों में भी। भाजपा को राजनीतिक नुकसान का अंदेशा सता रहा है। उसका एक डर यह है कि कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनावों में दूसरी पार्टियां इस कांड को जोर-शोर से मुद््दा बनाने की कोशिश करेंगी।

भाजपा को दूसरा डर अपनी छवि के नुकसान का है। कुछ महीनों से वह दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए लगातार प्रयत्नशील रही है। इसलिए पार्टी विवाद से पीछा छुड़ाने की जी-जान से कोशिश कर रही है। यों तो निलंबन खत्म करने का फैसला विश्वविद्यालय की सर्वोच्च निर्णयकारी समिति यानी कार्यपरिषद का है, पर क्या यह फैसला ऊपर से आए इशारे के बगैर हुआ होगा? यह दिलचस्प है कि इन छात्रों को ‘राष्ट्र-विरोधी गतिविधि’ की शिकायत पर कार्यपरिषद ने निलंबित किया था। अब उस आरोप पर परिषद कुछ नहीं कहना चाहती।

बंडारू दत्तात्रेय भी खामोश हैं जिन्होंने यह आरोप लगाते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री से कार्रवाई की सिफारिश की थी। स्मृति ईरानी का कहना था कि विश्वविद्यालय स्वायत्त है और पांच छात्रों के निलंबन के लिए केवल वही जिम्मेवार है। लेकिन उनके मंत्रालय की ओर से विश्वविद्यालय को कई बार भेजे गए स्मरण-पत्र से इस दावे की हवा निकल गई है। निलंबन तो वापस हो गया, मगर किसी भी स्तर पर जवाबदेही तय क्यों नहीं की गई।

रोहित वेमुला की आत्महत्या के कारणों तथा परिस्थितियों की जांच का एलान अभी तक क्यों नहीं किया गया है? पिछले एक दशक में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में आठ दलित छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। अगर इस विश्वविद्यालय से आगे जाकर, पूरे देश के पैमाने पर देखें तो पिछले चार साल में अठारह दलित छात्रों ने खुदकुशी की है। यह तथ्य बताता है कि शिक्षा संस्थानों के परिसर भी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न से अछूते नहीं हैं। पर अनुसूचित जाति-जनजाति की पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी अब संगठित और मुखर होने लगे हैं, जो कि मद्रास आईआईटी के आंबेडकर-पेरियार सर्किल की सक्रियता में दिखा तो हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की गतिविधियों में।

हर जगह उनका टकराव पारंपरिक उच्चता-बोध में पले-बढ़े समूहों और संगठनों से हो रहा है। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में यह एक भयावह मोड़ पर पहुंच गया तो इसलिए कि एक वर्ग को सत्ता के गलियारे में अपनी पहुंच का लाभ मिला। रोहित समेत पांच छात्रों का निलंबन यह भी दिखाता है कि विश्वविद्यालयों की कथित स्वायत्तता कितनी नाजुक है। ऊपर से आए एक संकेत मात्र से वह टूट कर बिखर जाती है। रोहित की खुदकुशी पर उठे विवाद के मद््देनजर दो संकल्प लिए जाने चाहिए। एक तो यह कि शैक्षिक संस्थानों में अनुसूचित जाति-जनजाति के विद्याथियों को परेशान करने का सिलसिला बंद होगा। दूसरा, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता की रक्षा की जाएगी।

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