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स्त्री का शौर्य

वायुसेना में महिलाओं को भी लड़ाकू विमान उड़ाने की इजाजत दिए जाने के बाद नौसेना में उन्हें महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे जाने की तैयारी शुरू हो गई है। नौसेना ने रक्षा मंत्रालय..

Author नई दिल्ली | October 27, 2015 11:11 PM
रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पहली महिला लड़ाकू पायलटों का चयन वर्तमान में वायुसेना एकेडमी में प्रशिक्षण ले रहीं महिलाओं के बैच से किया जाएगा। (फाइल फोटो)

वायुसेना में महिलाओं को भी लड़ाकू विमान उड़ाने की इजाजत दिए जाने के बाद नौसेना में उन्हें महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपे जाने की तैयारी शुरू हो गई है। नौसेना ने रक्षा मंत्रालय को इस आशय का प्रस्ताव भेजा है। रक्षामंत्री ने नौसेना के प्रस्ताव को उचित करार देते हुए जल्दी ही इस मामले में सकारात्मक फैसला करने का संकेत दिया है। हालांकि नौसेना ने महिलाओं को युद्धपोत चलाने की इजाजत देने से फिलहाल इनकार किया है, पर उन्हें समुद्री टोही यान चलाने का मौका दिया जाएगा। इससे महिला सैनिकों का मनोबल बढ़ा है।

कुछ दिनों पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का फैसला सुनाया था। सेना में बड़ी तादाद में महिलाएं तैनात हैं, पर उन्हें युद्धक्षेत्र में जाने की इजाजत इसलिए नहीं दी जाती कि वे स्वभाव से कोमल होती हैं और शारीरिक रूप से पुरुषों जितनी मजबूत नहीं मानी जातीं। खासकर लड़ाकू विमान या पोत चलाने के लिए जिस तरह की फुर्ती, फैसले करने में तेजी और खतरों का सामना करने के हौसले की जरूरत होती है, वह महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले कम आंकी जाती रही है।

मगर महिलाओं ने पिछले कुछ सालों में इस धारणा को कई तरह से तोड़ा है। वे युद्धक यानों के अलावा परिवहन से जुड़े दूसरे यानों का बखूबी संचालन करती हैं। यों भी सेना में भर्ती होने वाले हर अधिकारी और सिपाही की इच्छा रहती है कि वह युद्ध के दौरान अपनी सेवाएं दे। खासकर युद्धक यानों को चलाने का रोमांच हर प्रशिक्षित यान चालक सैनिक को होता है। इसके प्रशिक्षण के दौरान वही तैयारियां महिला पायलटों से भी कराई जाती हैं, जो पुरुष पायलटों से कराई जाती हैं। इसलिए प्रशिक्षण के बाद महिलाओं को युद्धक यान संचालन का मौका न दिया जाना एक तरह से उनके साथ भेदभाव को ही दर्शाता है।

वायुसेना में महिलाओं को लड़ाकू विमान न चलाने देने के पीछे एक भय यह भी काम करता रहा है कि अगर महिला पायलट दुश्मन देश की गिरफ्त में आ गर्इं तो उनके साथ उसका अशालीन व्यवहार पूरे देश के लिए शर्म का विषय हो सकता है। मगर युद्ध के समय कई ऐसे भी काम होते हैं, जिनमें दुश्मन देश की गिरफ्त में आने का खतरा नहीं होता, उन्हें महिला पायलट बखूबी निभा सकती हैं। नौसेना भी महिला पायलटों के लिए ऐसी जिम्मेदारी तय कर सकती है। जहां तक शारीरिक कष्ट, तेजी से फैसले लेने आदि की बात है, जब महिलाएं अंतरिक्ष यान में उड़ान भर कर तमाम तकलीफें सहन कर सकती हैं और जान का जोखिम उठाते हुए कठिन शोध कर सकती हैं तो लड़ाकू यान का संचालन उनके लिए क्यों कठिन माना जाना चाहिए।

इस बात के कई उदाहरण तलाशे जा सकते हैं कि जब भी जरूरत पड़ी है, महिलाओं ने स्थितियों के मुताबिक खुद को ढालते हुए बेहतर कौशल का प्रदर्शन किया है। जरूरत के मुताबिक तेजी से फैसले कर सकने की उनकी क्षमता के कई उदाहरण मौजूद हैं, जहां वे बड़ी कंपनियों के शीर्ष पदों का निर्वाह करते हुए सराहनीय नीतिगत फैसले करती हैं। लिहाजा, उम्मीद की जानी चाहिए कि नौसेना में टोही और युद्धक यानों के संचालन में वे पुरुषों से पीछे नहीं रहेंगी।

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