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संपादकीयः मदद का भरोसा

सरकार ने इस पैकेज के तहत एक अप्रैल से गरीबों को बैंकों के माध्यम से मदद देने की तैयारी की है। इसके तहत बीस करोड़ से ज्यादा महिला जनधन खाताधारकों को अगले तीन महीने तक पांच-पांच सौ रुपए, आठ करोड़ उनहत्तर लाख किसानों को अप्रैल में दो-दो हजार रुपए और तीन करोड़ गरीब वृद्धों, महिलाओं और दिव्यांगों को एक-एक हजार रुपए अगले तीन महीने तक उनके बैंक खाते के जरिए दिए जाएंगे।

Author Published on: March 28, 2020 12:04 AM
गरीब कोरोना से पलायन करने काे मजबूर हैं।

भारत में कोरोना संकट से निपटने के लिए देशभर में पूर्ण बंदी जैसे सख्त कदम के बाद आम जनता से लेकर छोटे-बड़े उद्योगों के सामने आई मुश्किलों को दूर करने के लिए केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ने जो पैकेज और रियायतें दी हैं, वह एक स्वागत योग्य कदम है। हालांकि जैसा संकट लोगों के सामने है, उसे देखते हुए इस तरह की राहत पर्याप्त नहीं कही जा सकती। बिना किसी पूर्व तैयारी के अचानक पूर्ण बंदी के बाद जिस तरह के हालात बने, उसमें सबसे ज्यादा संकट रोजाना छोटा-मोटा काम कर कमाने वालों के सामने खड़ा हो गया है। ज्यादातर फैक्ट्रियों और कारखानों में काम बंद हो गया। सबसे मुश्किल में तो वे लोग हैं जो दिहाड़ी करके अपना पेट पाल रहे थे। हालांकि सरकार का पैकेज एक लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए का है और इसमें गरीबों, किसानों, बुजुर्गों, स्वयं सहायता समूहों और निम्न आयवर्ग के लोगों को पैसा और राशन देने की बात कही गई है। पर व्यावहारिकता की कसौटी पर यह कितना खरा उतर पाएगा और लोगों की कितनी मदद कर पाएगा, यह बड़ा सवाल है।

सरकार ने इस पैकेज के तहत एक अप्रैल से गरीबों को बैंकों के माध्यम से मदद देने की तैयारी की है। इसके तहत बीस करोड़ से ज्यादा महिला जनधन खाताधारकों को अगले तीन महीने तक पांच-पांच सौ रुपए, आठ करोड़ उनहत्तर लाख किसानों को अप्रैल में दो-दो हजार रुपए और तीन करोड़ गरीब वृद्धों, महिलाओं और दिव्यांगों को एक-एक हजार रुपए अगले तीन महीने तक उनके बैंक खाते के जरिए दिए जाएंगे। अभी जिस तरह पूर्ण बंदी है, उसमें इतनी बड़ी संख्या में लोग कैसे बैंकों तक पहुंच पाएंगे और इतनी न्यून राशि से उनकी जरूरतें पूरी हो पाएंगी, यह सोचने की बात है। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों के पास बैंक खाता नहीं है, या जो किसी भी रूप में रोजगार के लिए कहीं पंजीकृत नहीं हैं, उन्हें आर्थिक मदद कैसे पहुंचाई जाएगी? भारत में असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की तादाद करोड़ों में है। इनमें ज्यादातर लोग वे हैं जो रिक्शा चलाने, बेलदारी करने जैसे काम करते हैं और रोजाना की कमाई से पेट भरते हैं। ये पूर्ण बंदी से उत्पन्न संकटों का सामना कैसे कर पाएंगे?

उद्योगों, छोटे-बड़े कारोबारियों को राहत देने के मकसद से रिजर्व बैंक ने भी कुछ बड़े कदम उठाए हैं और नीतिगत दरों में कटौती की है। जाहिर है, अब बैंकों को कर्ज सस्ता करने की दिशा में बढ़ना होगा। इसके अलावा बैंकों से साफ कहा गया है कि वे तीन महीने तक कोई कर्ज वसूली न करें और किसी भी कर्जदार से इस अवधि में ब्याज न वसूलें। पूर्ण बंदी के कारण छोटे उद्योगों और कारोबारियों के सामने उत्पादन और बिक्री की समस्या खड़ी हो गई है और इसका असर यह होगा कि वे कर्ज की किस्तें कैसे चुकाएं, कर्मचारियों को वेतन कैसे दें। हालांकि सरकार ने कर्मचारियों के भविष्य निधि अंशदान अपनी ओर से देने, जीएसटी रिटर्न दाखिल करने में छूट देने का भी एलान किया है, ताकि कारोबारियों पर ज्यादा बोझ न पड़े। रिजर्व बैंक ने करीब पौने चार लाख रुपए बैंकिंग प्रणाली में डालने की बात कही है, जिससे बैंकों को नगदी संकट का सामना न करना पड़े। पर मूल बात है सबसे निचले तबके को तत्काल राहत पहुंचाने की, जो अभी सबसे ज्यादा मुश्किल में है और बंदी के कारण राज्यों की सीमाओं में फंसा है और पुलिस प्रताड़ना का भी शिकार हो रहा है।

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