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संपादकीय: विरोध का अंदाज

रोड शो कर रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के काफिले पर एक युवक द्वारा जूता फेंके जाने की घटना निस्संदेह निंदनीय है।

Author Updated: September 28, 2016 4:49 AM
सीतापुर में रोड शो के दौरान राहुल गांधी पर एक शख्स ने जूता फेंकने की कोशिश की

उत्तर प्रदेश के सीतापुर में किसान महायात्रा के दौरान रोड शो कर रहे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के काफिले पर एक युवक द्वारा जूता फेंके जाने की घटना निस्संदेह निंदनीय है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी असहमति, आक्रोश या आपत्ति को व्यक्त करने का एक जायज और कानूनी तरीका होता है। लेकिन काफी समय से यह देखा जा रहा है कि कुछ सिरफिरे लोग कभी सुर्खियों में आने के लिए तो कभी अपनी बदहवासी में बेजा तरीके चुनते रहे हैं।

इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम, राकांपा नेता शरद पवार, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जैसे राजनेताओं में से किसी पर जूता फेंके जाने, किसी पर स्याही छिड़के जाने, किसी को थप्पड़ मारने जैसी हरकतें हो चुकी हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़ा संदेश देने की जरूरत है। आमतौर पर होता यह है कि इस तरह की हरकतें करने वाले लोगों के खिलाफ हल्की-फुल्की कार्रवाई करके मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। कई बार तो ऐसे लोगों के दुस्साहस को महिमामंडित भी किया जाता है। इस तरह की घटनाओं को मीडिया भी बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करता है। इस वजह से भी कुछ लोग तुरत-फुरत प्रचार पा जाने की गरज से ऐसी हरकतें करते रहते हैं। ऐसी घटनाओं को हतोत्साहित करने की जरूरत है, बजाय उछालने के। राहुल गांधी को लक्ष्य कर जूता फेंकने वाले युवक का कहना था कि यह रोड शो सिर्फ एक तमाशा है। कांग्रेस ने साठ साल में देश को तबाह कर दिया है। बिजली की कीमतें घटाने और कर्जमाफी जैसे वादे खोखले साबित हुए हैं।

राहुल गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में जहां एक तरफ नरमी से काम लिया है, वहीं भाजपा-संघ पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, आपका गुस्सा आपकी कमजोरी है। मैं आपके गुस्से और जूते से नहीं डरता। आपका गुस्सा आपके साथ, मेरा भाईचारा और प्यार मेरे साथ। मैं भाजपा और आरएसएस से डर कर किसानों की लड़ाई बंद नहीं करूंगा। राहुल गांधी की प्रतिक्रिया का पहला हिस्सा सराहनीय है। हालांकि पहले भी ऐसा हुआ कि बदसलूकी का निशाना बने राजनेताओं ने ऐसी हरकतों को मामूली बता कर क्षमा कर देने की भाव-मुद्रा अपनाई थी। अप्रैल 2014 में एक आॅटोरिक्शा चालक ने एक रोड शो में अरविंद केजरीवाल को थप्पड़ मार दिया था।

केजरीवाल ने उसके घर जाकर उससे सहानुभूति जताई थी। लेकिन राहुल की प्रतिक्रिया का दूसरा हिस्सा जल्दबाजी और राजनीतिक अतिरंजना से प्रेरित लगता है। जूता फेंकने वाले युवक की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। उसका कोई राजनीतिक रुझान भी नहीं पता चला है। ऐसे में इस घटना के पीछे, भाजपा और संघ की साजिश को सूंघना, एक तरह का अति-निष्कर्ष ही कहा जाएगा। बेहतर होता कि राहुल गांधी अपनी शालीन और क्षमा वाली मुद्रा में ही सीमित रहते। क्या इस घटना का कोई और सिरा या छोर हो सकता है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि आम आदमी सचमुच राजनेताओं या राजनीतिसे बहुत निराश है। कुछ सार्थक और सोद्देश्य न कर पाने की वजह से वह ऊलजलूल हरकतें करके अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति तो नहीं कर रहा? इस पहलू पर भी सोचने की जरूरत है।

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