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संपादकीय: टकराव का हासिल

रविंद केजरीवाल के घर हुई कथित घटना से उपजी असुविधाजनक स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बैठक से पहले मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री को बाकायदा पत्र भेज कर कहा कि चूंकि सरकारी कामकाज सुचारु रूप से चलते रहने के लिए बजट सत्र की तारीखें तय करना और बजट पारित कराना जरूरी है।

Author March 1, 2018 2:38 AM
उन्नीस फरवरी की रात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर हुई एक बैठक में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से मारपीट की खबर सामने आई थी।

किसी भी सरकार के सुचारु कामकाज के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक अधिकारियों से उसका तालमेल सही रहे। लेकिन हाल के दिनों में दिल्ली में जो हुआ, वह अप्रत्याशित है। गौरतलब है कि उन्नीस फरवरी की रात दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर हुई एक बैठक में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से मारपीट की खबर सामने आई। उसी घटना के बाद दिल्ली सरकार और अफसरशाही के बीच जो गतिरोध पैदा हुआ, वह अब भी कायम है और उसका सीधा असर सरकारी कामकाज पर पड़ा है। इस खींचतान के बीच मंगलवार को पहला मौका था जब दिल्ली मंत्रिमंडल और नौकरशाही की बैठक हुई। पिछले कई दिनों से माफी और कानूनी कार्रवाई की मांग पर अड़े होने के बावजूद शीर्ष स्तर के अफसर बैठक में शामिल हुए। फिर भी यह साफ है कि गतिरोध टूटा नहीं है, क्योंकि शायद यह पहली बार है जब किसी राज्य सरकार के मंत्रिमंडल की बैठक सुरक्षा के साए में हुई। दरअसल, अगले वित्त वर्ष के दिल्ली के बजट के प्रारूप से संबंधित बैठक में आए मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के अलावा गृह विभाग के प्रधान सचिव मनोज परीदा और वित्त विभाग से प्रधान सचिव एसएन सहाय की सुरक्षा के लिए करीब डेढ़ दर्जन पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया था।

अरविंद केजरीवाल के घर हुई कथित घटना से उपजी असुविधाजनक स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बैठक से पहले मुख्य सचिव ने मुख्यमंत्री को बाकायदा पत्र भेज कर कहा कि चूंकि सरकारी कामकाज सुचारु रूप से चलते रहने के लिए बजट सत्र की तारीखें तय करना और बजट पारित कराना जरूरी है, इसलिए वे बैठक में शामिल हो रहे हैं; लेकिन मुख्यमंत्री सुनिश्चित करें कि वहां आए किसी भी अधिकारी पर शारीरिक हमला नहीं होगा या गाली-गलौज नहीं की जाएगी। गौरतलब है कि केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल अनिल बैजल के बीच पहले से ही जिस तरह विवाद की स्थिति बनी हुई थी, उसमें नए घटनाक्रम ने ज्यादा उलझन पैदा कर दी है। एक ओर, उपराज्यपाल ने केजरीवाल को पत्र लिख कर कहा कि वे खुद अफसरों से बातचीत करें, क्योंकि उस अप्रिय घटना की वजह से अफसरों का मनोबल गिरा है। वहीं दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सख्त तेवर के साथ जवाब दिया कि अफसरों के रवैये के चलते पिछले तीन महीने से आंगनबाड़ी कर्मचारियों का वेतन रुका हुआ है, क्या उससे अफसरों का मनोबल नहीं गिरता है!

जाहिर है, इस समूचे प्रसंग में जिस तरह एक सरकार के तहत दो पक्ष बन गए हैं और दोनों ही अपने रुख पर अड़े हुए हैं, उससे आखिरी नुकसान दिल्ली की आम जनता को होना है। यों भी एक सरकार के तहत यह विचित्र स्थिति है कि अधिकारी केवल लिखित संवाद के जरिए काम करें और मंत्री या विधायक के साथ किसी भी बैठक का बहिष्कार करें! ऐसे में अगर प्रशासनिक कामकाज में रुकावट आती है तो उसका सीधा असर योजनाओं के अमल पर पड़ता है। इसलिए अफसरों के संगठन को क्या विरोध के अपने तरीके पर सोचने की जरूरत नहीं है, ताकि जनता के हित में होने वाले काम बाधित न हों? लेकिन सवाल है कि अगर अरविंद केजरीवाल के आवास पर हुई घटना के असर से आम आदमी पार्टी की सरकार अनजान नहीं है और उसे दिल्ली की जनता की फिक्र है तो क्या उसे स्थितियों या अफसरशाही के साथ संबंधों को सहज करने के लिए पहलकदमी नहीं करनी चाहिए?

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