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फैसले का सबक

पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान को अनिवार्य बनाने की गुजरात सरकार की अधिसूचना पर हाइकोर्ट ने रोक लगा दी। राज्य सरकार के इस फैसले का यही हश्र होना था। पंचायतों और स्थानीय निकायों के निर्वाचन की बाबत राज्य सरकारों को कुछ विशेष अधिकार हासिल हैं। पर कोई भी राज्य सरकार इस हद […]

Author August 24, 2015 3:08 PM
गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल (फाइल फोटो)

पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान को अनिवार्य बनाने की गुजरात सरकार की अधिसूचना पर हाइकोर्ट ने रोक लगा दी। राज्य सरकार के इस फैसले का यही हश्र होना था। पंचायतों और स्थानीय निकायों के निर्वाचन की बाबत राज्य सरकारों को कुछ विशेष अधिकार हासिल हैं। पर कोई भी राज्य सरकार इस हद तक नहीं जा सकती कि वह केंद्रीय कानून या संवैधानिक प्रावधानों से उलट फैसला कर डाले। गुजरात सरकार ने यही गलती की। हाइकोर्ट ने स्थगन आदेश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मतदान के अधिकार को मतदान के कर्तव्य या मजबूरी में नहीं बदला जा सकता; मतदान के अधिकार में मतदान से अलग रहने का अधिकार भी शामिल है। जनप्रतिनिधित्व कानून समेत चुनाव संबंधी जितने भी कानून हैं, सबमें मतदान को स्वैच्छिक माना गया है। इसे उलटने का फैसला गुजरात सरकार ने क्यों किया? पर इसके लिए केवल आनंदीबेन पटेल सरकार दोषी नहीं है।

इसकी पहल गुजरात ने 2009 में की, तब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे। पर राज्यपाल के एतराज के कारण संबंधित विधेयक अटका रहा। तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने स्थानीय प्राधिकार विधेयक, 2009 में अनिवार्य मतदान के प्रावधान को हटाने का सुझाव दिया था। पर गुजरात सरकार ने 2011 में फिर वैसा ही विधेयक विधानसभा से पारित कराया। उस पर न राज्यपाल की हिदायत का असर हुआ, न विपक्ष के विरोध और बहिष्कार का। राज्यपाल की मंजूरी के अभाव में विधेयक एक बार फिर लटक गया। लेकिन मोदी के केंद्र की सत्ता में आने के बाद बनाए गए राज्यपाल ओपी कोहली ने विवादास्पद विधेयक को अपनी स्वीकृति दे दी।

विधेयक में मतदान में शामिल न होने पर सौ रुपए जुर्माने का प्रावधान है। मतदान से गैर-हाजिर रहने को दंडनीय बनाने का निर्णय एक राज्य सरकार कैसे कर सकती है? पंचायतों-स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान के नियम-कायदे लोकसभा और विधानसभा के चुनाव से बुनियादी रूप से अलग कैसे हो सकते हैं? संसद और विधानसभाओं में भी, जहां तमाम विधायी फैसले लिए जाते हैं, मतदान की अनिवार्यता नहीं है। अनिवार्य मतदान के पक्ष में गुजरात सरकार यह दलील देती रही कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभी की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकेगी। पर यह बात तो लोकसभा और विधानसभा के चुनाव की बाबत भी कही जा सकती है। वहां मतदान की अनिवार्यता नहीं है, तो पंचायतों और स्थानीय निकायों के चुनावों में ही क्यों?

अगर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत ही करना है, तो वे कदम क्यों नहीं उठाए जाते जो विधि आयोग से लेकर चुनाव सुधार पर समय-समय पर बनी समितियों ने सुझाए हैं। उनकी रिपोर्टें धूल फांक रही हैं। केंद्रीय सूचना आयोग ने राजनीतिक दलों को सूचनाधिकार के दायरे में लाने का फैसला सुनाया था। मगर तमाम दलों ने अपनी सम्मिलित संसदीय शक्ति का बेजा फायदा उठाते हुए उस फैसले को पलीता लगा दिया। चुनावी घोषणापत्रों के क्रियान्वयन को कानूनन अनिवार्य बनाने की पहल कोई पार्टी क्यों नहीं करती? हाइकोर्ट का फैसला गुजरात सरकार के लिए झटका भी है और एक संवैधानिक सबक भी।

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