खुलना स्कूलों का

पिछले सवा साल के दौरान घर से पढ़ाई ने बच्चों पर काफी असर डाला है। पहली कक्षा से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई ऑनलाइन चलती रही। यह मजबूरी भी थी। पिछले एक साल में देश को जिन दो घातक लहरों का सामना करना पड़ा, उसमें जान बचाना ही सर्वोपरि था।

School, Jansatta Editorial Story
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस फोटो)

ज्यादातर राज्यों ने अब सवा साल से बंद पड़े स्कूलों को खोलने का इरादा बना लिया है। कुछ राज्यों ने तो पहले ही बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थियों को स्कूल आने की अनुमति दे दी थी। संक्रमण के मामले कम पड़ जाने के साथ ही राज्यों ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। यह जरूरी भी था। राजस्थान, ओड़िशा, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब आदि राज्यों में इस हफ्ते स्कूली गतिविधियां जोर पकड़ने लगेंगी। हरियाणा में बड़ी कक्षाएं तो पहले ही शुरू हो चुकी थीं, अब आठवीं तक की कक्षा के विद्यार्थियों के लिए भी स्कूल खोल दिए हैं।

महाराष्ट्र में तो पंद्रह जुलाई से स्कूल खुल चुके हैं। हालांकि अभी कई राज्य इस असमंजस में हैं कि किस कक्षा तक के लिए स्कूल खोले जाएं। यह तो तय है कि जैसे ही स्कूल खुलेंगे, विद्यार्थियों की भीड़ बढ़ेगी। और इसी के साथ संक्रमण का खतरा भी बढ़ेगा। पूर्णबंदी खत्म होने के बाद चरणबद्ध तरीके से काफी हद तक प्रतिबंध हटाए जा चुके हैं। दफ्तरों से लेकर बाजार तक खुल गए हैं। जिम, सिनेमाघर भी चालू हो चुके हैं। ऐसे में स्कूलों को भी अब और लंबे वक्त तक बंद रखना न तो संभव ही है, न ही व्यावहारिक।

पिछले सवा साल के दौरान घर से पढ़ाई ने बच्चों पर काफी असर डाला है। पहली कक्षा से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई ऑनलाइन चलती रही। यह मजबूरी भी थी। पिछले एक साल में देश को जिन दो घातक लहरों का सामना करना पड़ा, उसमें जान बचाना ही सर्वोपरि था। इसलिए घर से पढ़ाई के तरीके को विकल्प के रूप में आजमाया गया। हालांकि ऑनलाइन कक्षाओं और परीक्षाओं का प्रयोग बहुत हद तक कामयाब नहीं कहा जा सकता। ज्यादातर लोगों के पास ऑनलाइन शिक्षा के बुनियादी साधन जैसे स्मार्टफोन, कंप्यूटर, लैपटॉप और इंटरनेट आदि हैं ही नहीं। ऐसे में विद्यार्थियों का बड़ा हिस्सा शिक्षा से वंचित भी रहा। ऐसे विद्यार्थियों की तादाद भी कम नहीं होगी जो आधे-अधूरे मन से ऑनलाइन व्यवस्था को अपनाने के लिए मजबूर हुए।

ऐसा ही बड़ा वर्ग शिक्षकों का भी है जिसे ऑनलाइन शिक्षा का कोई पहले कोई तजुर्बा नहीं था। इसलिए पिछले सवा साल में जिसने जैसी भी पढ़ाई की, वह गुणवत्ता के पैमाने पर स्कूल जाकर की जाने वाली पढ़ाई की तुलना में कमतर ही साबित होगी। बिना परीक्षा के अगली कक्षा में चढ़ा देने जैसे फैसले भी इसीलिए करने पड़े ताकि बच्चों का भविष्य खराब न हो। इसलिए अब स्कूल खुलें और सही तौर पर पढ़ाई का सिलसिला शुरू हो, इससे बेहतर हो ही क्या सकता है!

अब और सावधानी की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि तीसरी लहर को लेकर लगातार चेतावनियां आ रही हैं। ऐसे में स्कूलों में बचाव के पुख्ता बंदोबस्त नहीं हुए तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं। कक्षाओं में सारे बच्चों को छह फीट की दूरी पर बैठाना, लंबे समय तक मास्क पहनना, बार-बार हाथ धुलवाना कठिन काम है। इसलिए छोटे-छोटे समूहों में बच्चों को बुलाने के इंतजाम हों जाएं तो खतरा कुछ कम किया जा सकता है।

हालांकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने प्राथमिक स्कूलों को पहले खोले जाने की सलाह दी है। इसके पीछे वैज्ञानिक दलील यह है कि कोरोना विषाणु जिस एस रिसेप्टर के जरिए कोशिकाओं से जुड़ता है, वह बच्चों में कम होता है। इससे छोटे बच्चों में कुदरती तौर पर खतरा कम रहता है। चौथे सीरो सर्वे से इसकी पुष्टि हुई है। जो हो, स्कूलों को खोलने से पहले बच्चों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि और बड़ा संकट खड़ा न हो जाए।

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