चीन का रुख

चीन के रवैये को लेकर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर समय-समय पर जो चिंता जताते रहे हैं, वे बेवजह नहीं हैं। सीमा संबंधी विवाद को सुलझाने के लिए चीन ने अब तक भारत के साथ जो समझौते किए हैं, उनका वह खुला उल्लंघन कर रहा है।

Jansatta Editorial
वैश्विक सम्मेलनों में भारत सरकार ने चीन की दुस्साहसिक गतिविधियों का कड़ा जवाब देता रहा है।

पूर्वी लद्दाख में चल रहे गतिरोध को दूर करने के लिए चौदहवें दौर की सैन्य स्तरीय वार्ता को लेकर भारत और चीन में सहमति बनना अच्छा संकेत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चीन इस पर कुछ सकारात्मक रुख दिखाएगा, ताकि पूर्वी लद्दाख में तनाव खत्म किया जा सके। सीमा संबंधी मामलों पर विचार-विमर्श करने वाले दोनों देशों के कार्यकारी तंत्र के प्रतिनिधियों की हाल में हुई बैठक में पूर्वी लद्दाख के हालात की समीक्षा के बाद तय हुआ कि अब चौदहवें दौर की वार्ता होनी चाहिए।

पिछले साल मई में गलवान घाटी विवाद के बाद दोनों देशों के बीच अब तक तेरह दौर की सैन्य स्तर की बातचीत हो चुकी है। पर वार्ताओं में चीन जो रवैया अपनाता रहा है, उससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि बातचीत का तो वह सिर्फ दिखावा करता है। उसका मकसद विवाद को बनाए रखना है। ऐसा सिर्फ गलवान गतिरोध के संदर्भ में ही देखने को नहीं मिल रहा, बल्कि पिछले डेढ़ साल में भारत से लगी सीमा पर चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां बता रही हैं कि वह विवाद के नए आधार भी तैयार कर रहा है।

भारत और चीन के बीच पिछले महीने तेरहवें दौर की वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई थी। तब भी वार्ता का मुख्य मुद्दा हाट स्प्रिंग और देपसांग से सैनिकों को हटाने के बारे में सहमति बनाने को लेकर था। लेकिन चीन ने इन इलाकों से सैनिकों को हटाने के भारत के प्रस्तावों को अव्यावहारिक और अतार्किक करार देकर वार्ता को पटरी से उतार दिया था।

चीन का ऐसा बदला रुख तब देखने को मिला जब इस साल के मध्य में ताजिकस्तिान की राजधानी दुशान्बे में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों के बीच वार्ताओं के जरिए समाधान की कोशिशें जारी रखने पर सहमति बनी थी। जाहिर है, चीनी विदेश मंत्री अपने भारतीय समकक्ष के साथ बैठकों में जो फैसला करते हैं, उस पर अमल उलट होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो तेरहवें दौर की वार्ता में चीनी पक्ष समाधान के रास्ते पर बढ़ने के प्रयास करता, न कि वार्ता में अड़ियल रुख अपनाकर उसे नाकाम बनाने का।

गौरतलब है कि पूर्वी लद्दाख के सीमा विवाद को लेकर भारत का रुख पहले से ही स्पष्ट रहा है कि जब तक विवादित स्थलों से सैनिकों को नहीं हटाया जाता, तब तक इलाके में शांति की बात करना बेमानी होगी। मुश्किल यह है कि चीन पर आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता। वह कब पलटी मार जाए, कोई नहीं जानता। इसलिए अब देखना यह है कि चौदहवें दौर की वार्ता के लिए वह कब तैयार होता है और वार्ता में कैसा रुख अख्तियार करता है। गलवान घाटी की घटना और उसके बाद चीन के बदले रुख से यह साफ हो गया है कि वह भारत के साथ सीमा विवाद को आसानी से हल नहीं करने वाला।

चीन के रवैये को लेकर भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर समय-समय पर जो चिंता जताते रहे हैं, वे बेवजह नहीं हैं। सीमा संबंधी विवाद को सुलझाने के लिए चीन ने अब तक भारत के साथ जो समझौते किए हैं, उनका वह खुला उल्लंघन कर रहा है। सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भारत से लगती सीमा के पास चीनी सेना की बढ़ती गतिविधियां चिंता पैदा करने वाली हैं। भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिकों की घुसपैठ के मामले सामने आते ही रहे हैं। ऐसे में कैसे माना जाए कि चीन भारत के साथ सीमा विवाद का समाधान निकालने के लिए हाथ बढ़ाएगा!

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