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मौत के मुहाने

शहरों में मल निस्तारण वाले नाबदान काफी गहरे बनाए जाते हैं। अक्सर उनमें कोई चीज फंस या अटक जाती है, जिसके चलते उनका जल-मल प्रवाह बाधित होता है।

Scavenger, Death of scavengerनरक से भी बुरी स्थिति में मौत से जूझते हुए काम करते हैं सफाई कर्मचारी। (एक्सप्रेस फोटो: ताशी तोब्याल)

जहरीले जल-मल निकासी वाले गहरे नाबदानों में उतरने से अनेक सफाई कर्मियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। इसे लेकर जब-तब विरोध के स्वर उठते रहते हैं, बिना सुरक्षा उपायों के सफाई कर्मियों को नाबदानों में उतारने पर रोक की सिफारिश भी अनेक मौकों पर की जा चुकी है। मगर लगता है, उन घटनाओं से लोग सबक लेना जरूरी नहीं समझते। अगर समझते तो दिल्ली के एक बरातघर में सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए दो मजदूरों को न उतारते और वे बेवजह जान न गंवा बैठते। आरोप है कि बरातघर के कर्ताधर्ताओं ने दो ऐसे लोगों को टैंक की सफाई के लिए नीचे उतारा, जिनका सफाई का कोई अनुभव नहीं था।

पैसे का लालच और दबाव देकर उन्हें सफाई के लिए नीचे उतार दिया गया। ऐसे में उन्हें नाक-मुंह ढंकने वाले और दूसरे सुरक्षा उपकरण मुहैया कराने का तो सवाल ही कहां उठता था। अब पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की जांच की जा रही है। मगर इससे ऐसी लापरवाही बरतने वालों को कहां तक सबक मिल पाएगा या वे खुद सबक ले पाएंगे, कहना मुश्किल है।

शहरों में मल निस्तारण वाले नाबदान काफी गहरे बनाए जाते हैं। अक्सर उनमें कोई चीज फंस या अटक जाती है, जिसके चलते उनका जल-मल प्रवाह बाधित होता है। उस अवरोध को निकालना जरूरी हो जाता है। यों भी सामान्य अवस्था में इन नालियों की सफाई की जरूरत पड़ती है, नहीं तो उनमें गाद जमा होते-होते जल-मल का प्रवाह बाधित कर देती है। उन नालों में जहरीली गैसें भरी होती हैं, जिसकी वजह से अनेक सफाई कर्मियों की मौत हो चुकी है।

इसे देखते हुए नगर निगम ने नियम बनाया कि बिना सुरक्षा उपकरणों और जरूरी उपायों को किसी सफाई कर्मचारी को सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए नीचे नहीं उतारा जाएगा। नियम यह भी बना कि सीवरों, सेप्टिक टैंकों जैसी खतरनाक जगहों की सफाई के लिए मानव श्रम के बजाय मशीनों का उपयोग किया जाए। बहुत जरूरी होने पर ही पुख्ता सुरक्षा उपायों के साथ सफाई कर्मियों को नाले में उतारा जाए।

इसके लिए दिल्ली नगर निगम ने मशीनें भी खरीदी हैं। मगर अनेक मामलों में तर्क दिया जाता है कि सफाई की मशीनें हर जगह इस्तेमाल नहीं की जा सकतीं। कहीं संकरी गलियों की वजह से उन्हें वहां तक नहीं ले जाया जा पाता, तो कहीं सफाई से निकलने वाले अपशिष्ट निस्तारण की उचित जगह नहीं है। इस तरह नालियों के भीतर आदमी को उतारना उन्हें ज्यादा आसान और कारगर उपाय नजर आता है।

नगर निगमों के कामकाज का तरीका जगजाहिर है। सीवरों का बदबूदार पानी उफन कर कई दिन तक सड़कों पर, मुहल्लों में बहता रहता है, पर कई बार बुलाने के बावजूद सफाईकर्मी नहीं पहुंचते। ऐसे में कई लोग खुद अपने प्रयास से सफाईकर्मी बुला कर उन्हें ठीक कराने का प्रयास करते हैं। बरातघर के ताजा मामले में तो आरोप है कि मारे गए दोनों कर्मियों को बरातघर के कर्ताधर्ताओं ने जबरन नीचे उतारा था।

पर हकीकत यह भी है कि कई सफाईकर्मी मुंहमांगी रकम लेकर नीचे उतरने को खुद तैयार हो जाते हैं। ऐसे में जहरीली गैसों से बचाव के लिए जरूरी उपकरणों का उपयोग नहीं हो पाता। ऐसी घटनाएं प्राय: होती रहती हैं। तमाम सख्त नियम-कायदों और हिदायतों के बावजूद जहरीले नाबदानों की सफाई के लिए मानव श्रम के उपयोग पर रोक नहीं लग पाई है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए और कठोर प्रावधान करने की जरूरत है।

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