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दमन की राह

विडंबना यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन में सरकार, प्रशासन और पुलिस आमतौर पर यह मान कर चलती है कि आंदोलनकारियों का दमन करना ही उनका प्राथमिक कर्तव्य है। यह एक परिपक्व लोकतंत्र का चरित्र नहीं होता है।

हांसी में विरोध कर रहे किसानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज करने के बाद आंसू गैस छोड़ी। (फोटोः स्क्रीनशॉट@mandeeppunia1)

नए कृषि कानूनों के मसले पर शुरू हुआ आंदोलन अब तक जिस शक्ल में चल रहा है, उससे यह साफ है कि किसान आमतौर पर लोकतांत्रिक तौर-तरीके से ही अपनी मांगों के पक्ष में प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि इस आंदोलन को लेकर सरकार का रवैया बहुत उदार नहीं दिखता है। पिछले कई महीने से न केवल किसानों और सरकार के बीच बातचीत बंद है, बल्कि कई मौकों पर सरकार ने आंदोलनकारियों के खिलाफ सख्त रवैया भी अख्तियार किया।

नए कृषि कानूनों की वापसी की मांग को लेकर सरकारी उदासीनता के बीच किसानों के पास यही विकल्प बचता है कि वे विरोध प्रदर्शनों के जरिए सरकार को अपनी बात पर गौर करने के लिए कहें। लेकिन सरकारी तंत्र और नेतृत्व के भीतर इस समस्या को लेकर अपेक्षित जिम्मेदारी की भावना नहीं सामने आ रही है। उल्टे जब किसान लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों के जरिए सरकार को उसकी जिम्मेदारी की याद दिलाना चाहते हैं तो उनके खिलाफ पुलिस बलों के सहारे दमन की कार्रवाई की जाती है। गौरतलब है कि रविवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री हिसार में एक अस्पताल का उद्घाटन करने पहुंचे तो किसानों ने उनके दौरे का विरोध किया। उनका यह विरोध पूर्व घोषित था, इसलिए कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने प्रदर्शनों का स्वरूप लोकतांत्रिक बनाए रखने की कोशिश की थी। लेकिन तयशुदा कार्यक्रम निपटने और मुख्यमंत्री के चले जाने के बाद जब किसान प्रदर्शन कर रहे थे, तब अचानक ही वहां मौजूद पुलिस ने उन पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं और आंसू गैस के गोले भी छोड़े। नतीजतन, किसानों की तरफ से भी पथराव हुआ। सवाल है कि ऐसी अराजकता की स्थिति न आने देने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी!

किसानों ने एक दिन पहले अपने प्रदर्शन के बारे में घोषणा कर दी थी। लेकिन क्या सरकार की ओर से कोई नेता, अधिकृत अधिकारी या पुलिस अधिकारी ने इस मसले पर किसानों से बात करने की कोशिश की थी? पुलिस ने जिस तरह बेहरमी से किसानों पर लाठी चार्ज किया, क्या वह आखिरी विकल्प था? पुलिस और प्रशासन के उच्च स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारी समय के अनुकूल विवेक का प्रयोग कर हिंसा की स्थिति को अधिकतम स्तर तक रोकने की भी होती है।

विडंबना यह है कि किसी भी लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन में सरकार, प्रशासन और पुलिस आमतौर पर यह मान कर चलती है कि आंदोलनकारियों का दमन करना ही उनका प्राथमिक कर्तव्य है। यह एक परिपक्व लोकतंत्र का चरित्र नहीं होता है। आंदोलनकारियों को पुलिस की हिंसा के जरिए चुप कराने की कोशिशें दीर्घकालिक शांति या समाधान का रास्ता नहीं निकाल पाती हैं। जहां तक नए कृषि कानूनों को खत्म कराने के मसले पर खड़े हुए किसानों के आंदोलन का सवाल है, तो इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दें तो अब तक इसका स्वरूप लोकतांत्रिक ही रहा है और आंदोलनकारियों ने अधिकतम संयम का परिचय दिया है।

किसान नेताओं ने अपनी मांगों को लेकर सरकार से बातचीत का सिरा कायम रखने की हर संभव कोशिश की है। लेकिन पिछले काफी समय से किसानों और सरकार के बीच संवाद तक बंद है और दोनों में से कोई पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है। क्या सरकार को यह नहीं लगता है कि अगर उसका पक्ष सही है तो वह संवाद के जरिए किसानों को सहमत करने की कोशिश करे? या फिर अगर किसानों की मांगों के पीछे तर्क ज्यादा मजबूत है तो सरकार अपनी जिद पर पुनर्विचार करे? जो हो, लोकतंत्र का यह तकाजा है कि जनता अपनी जरूरतों और अधिकारों के लिए सरकार के सामने सवाल उठाए और उस पर गौर करना सरकार की जिम्मेदारी है।

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