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संक्रमण का दायरा

कोरोना की पहली लहर के समय ही चिंता जताई जा रही थी कि अगर यह संक्रमण गांवों में फैलना शुरू हो गया, तो उस पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले ही सबसे खराब स्थिति में हैं।

Updated: May 17, 2021 12:24 AM
अस्पताल के वेंटिलेटर पर दाखिल कोरोना मरीज। (फोटोः पीटीआई)

हालांकि कुछ दिनों से देश में कोरोना संक्रमण की दर पहले की तुलना में घटती हुई दर्ज हो रही है, मगर गांवों में फैल गई इस महामारी से सरकारों के माथे पर स्वाभाविक ही चिंता की लकीर गहरा गई है। कुछ राज्यों में स्थिति बहुत बुरी है। इसे लेकर प्रधानमंत्री ने भी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने सबसे अधिक प्रभावित चार राज्यों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ बैठक की। दरअसल, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में स्थिति काबू से बाहर हो गई है। खासकर उत्तर प्रदेश में इलाज न मिल पाने की वजह से इतनी अधिक मौतें हो रही हैं कि मृतकों का अंतिम संस्कार करना भी मुश्किल बना हुआ है। बहुत सारी लाशें गंगा में बहा दी जा रही हैं। इस घटना ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। इसे लेकर उत्तर प्रदेश सरकार कुछ सतर्क हुई है। मुख्यमंत्री ने कुछ शहरों का दौरा कर वहां की स्वास्थ्य सुविधाओं का जायजा लिया, हर जिले में शिकायत केंद्र बनाए गए हैं और प्रशासन को चौकन्ना कर दिया गया है। पर देखना है, वहां गांवों में फैल रहे इस संक्रमण पर किस तरह और कब तक काबू पाया जा सकता है।

कोरोना की पहली लहर के समय ही चिंता जताई जा रही थी कि अगर यह संक्रमण गांवों में फैलना शुरू हो गया, तो उस पर काबू पाना मुश्किल हो जाएगा। क्योंकि ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाएं पहले ही सबसे खराब स्थिति में हैं। मगर उस समय भी मुख्य रूप से इस संक्रमण को रोकने की तैयारियां शहरों में ही केंद्रित रहीं, गांवों में इसके लिए कोई एहतियाती उपाय नहीं किए गए। फिर जैसे ही पहली लहर का रुख उतार पर हुआ और पूर्णबंदी हटा ली गई, लोग सामान्य दिनों की तरह ही भीड़भाड़ लगाते दिखाई देने लगे। हालांकि बार-बार हिदायत दी जाती रही कि वे कोरोना संक्रमण से बचाव संबंधी उपायों का पालन करने में लापरवाही न बरतें, मगर उसका उन पर कोई असर नहीं दिखाई दिया। सरकारों ने भी मान लिया था कि अब कोरोना का खतरा टल चुका है, इसलिए उन्होंने कड़ाई करना तो दूर, कोरोना के लिए बनाई गई व्यवस्था को धीरे-धीरे समेटना शुरू कर दिया था।

फिर कोरोना लहर के समय ही पहले बिहार में फिर अन्य चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा के चुनाव संपन्न कराए गए। उसी दौरान उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराए गए। तमाम मांगों के बावजूद चुनाव प्रक्रिया में अपेक्षित सावधानी नहीं बरती गई, जिसका नतीजा यह हुआ कि कोरोना महामारी बन कर गांवों में भी फैलना शुरू हो गया।

अब विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने माना है कि भारत में स्थिति बहुत चिंताजनक है। कोरोना की दूसरी लहर पहली की अपेक्षा ज्यादा खतरनाक रूप में प्रकट हुई है। अभी तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में अगर ग्रामीण इलाकों में फैली इस महामारी पर काबू नहीं पाया गया, तो भारी तबाही की आशंका जताई जा रही है। मगर राज्य सरकारें इसके लिए कितनी तैयार हैं, अभी दावा नहीं किया जा सकता। कई सरकारें बीमारी पर काबू पाने के बजाय आंकड़ों को छिपाने पर अधिक जोर देती देखी जा रही हैं। जैसे भी हो, जब तक गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने, टीकाकरण, जांच और उपचार संबंधी सुविधाओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाएगा, यह महामारी कब फिर से और तबाही मचानी शुरू कर देगी, कहना मुश्किल है।

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