सुरक्षा के बांध

बांध तभी खतरनाक साबित होते हैं, जब उनका उचित रखरखाव न हो। बांधों की मजबूती बनाए रखने के अलावा उनकी जलसंग्रहण क्षमता को भी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल की दरकार है। बांधों की सुरक्षा से जुड़ा कानून बन जाने के बाद यह उम्मीद जगी है कि बांधों से संबंधित शिकायतों और उनसे संभावित खतरों का व्यावहारिक आकलन करते हुए उन सब पर पारदर्शी ढंग से काम हो सकेगा।

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तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीकात्मक प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। Photo Source- Pixabay

नदियों पर बांध बना कर जगह-जगह पानी रोकने की व्यवस्था इसलिए की गई कि उससे पानी की बर्बादी रुकेगी, उस पानी का उपयोग खेती-किसानी और उद्योगों आदि में हो सकेगा। बड़े बांधों पर बिजली संयंत्र भी लगाए गए। मगर ज्यादातर जगहों पर बांधों के रखरखाव में लापरवाही देखी जाती है, जिसके चलते भारी बरसात के समय उनके टूट कर आसपास के गांवों-कस्बों को जलमग्न कर देने की अशंका बनी रहती है। अक्सर बरसात में कहीं न कहीं बांध के टूटने और तबाही मचाने की खबरें आती रहती हैं।

इसके अलावा बांधों के जलसंग्रहण क्षेत्र में गाद भर जाने की वजह से उनकी क्षमता काफी कम हो गई है, जिसके चलते अक्सर भारी बारिश के वक्त उन्हें अचानक खोल दिया जाता है, जिससे शहरों में तबाही मचनी शुरू हो जाती है। इन स्थितियों से बचने और बांधों को सुरक्षित बनाने के लिए उनसे संबंधी कानून बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही थी। अब वह कानून बन जाने से इस दिशा में बेहतर नतीजों की उम्मीद स्वाभाविक है। हालांकि इस कानून का मसौदा करीब बीस साल पहले ही बन गया था, मगर उसे संसद में पेश नहीं किया जा सका। दो साल पहले इसे लोकसभा ने पास कर दिया था। राज्यसभा के पटल पर चालू सत्र में रखा जा सका और अंतत: उसे मंजूरी मिल गई।

हालांकि इस विधेयक को लेकर राज्यसभा में विपक्षी दलों ने विरोध किया था। उनकी मांग थी कि इसे प्रवर समिति के समक्ष रखा जाना चाहिए। मगर सरकार ने उनकी मांग मानने से इनकार कर दिया और विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया। अगर इसे प्रवर समिति को सौंपा जाता तो जाहिर है, इसे कानून का रूप लेने में अभी और वक्त लगता। इस कानून के बनने के बाद सरकार का दावा है कि बांधों की सुरक्षा और उन्हें लेकर राज्य सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सकेगी।

देश के कुल बांधों में से करीब बानबे फीसद दो राज्यों की सीमाओं पर स्थित हैं। उन्हें लेकर राज्य सरकारों में विवाद की स्थिति भी देखी जाती है। बांधों का रखरखाव संवेदनशील मसला है। इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही या कोताही लाखों लोगों की जान के साथ खिलवाड़ साबित हो सकती है। इसलिए राज्य सरकारों की जवाबदेही तय करने वाले कानून की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। इनमें से ज्यादातर बांधों को बने हुए काफी समय बीत चुका है, उनकी मरम्मत, सफाई आदि पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।

हालांकि बांधों की अवधारणा को कई लोग ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि बांध हमेशा बरसात के वक्त तबाही का कारण बनते हैं। मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इससे खेती और उद्योग समूहों को पानी उपलब्ध कराने में जो मदद मिलती है, वह किसी और साधन से मुमकिन न होता। नदी जोड़ योजना का प्रस्ताव भी इसी दृष्टि से रखा गया था।

बांध तभी खतरनाक साबित होते हैं, जब उनका उचित रखरखाव न हो। बांधों की मजबूती बनाए रखने के अलावा उनकी जलसंग्रहण क्षमता को भी बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल की दरकार है। बांधों की सुरक्षा से जुड़ा कानून बन जाने के बाद यह उम्मीद जगी है कि बांधों से संबंधित शिकायतों और उनसे संभावित खतरों का व्यावहारिक आकलन करते हुए उन सब पर पारदर्शी ढंग से काम हो सकेगा।

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