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हिंसा का मानस

इंटरनेट पर कई ऐसे खेल आए, जिनकी लत के शिकार बच्चों ने खुदकुशी कर ली या किसी की जान ले ली। तमाम अध्ययनों से जाहिर है कि ज्यादा समय मोबाइल फोन या कंप्यूटर पर खेलने में बिताने की वजह से बच्चों के शरीर और मन पर बुरा असर पड़ रहा है। दुनिया भर में इस लत का इलाज करने के लिए अस्पतालों में अलग से विभाग खोल दिए गए हैं। मगर इस लत में कमी के बजाय बढ़ोतरी ही दर्ज हो रही है।

हिंसा का मानस

बच्चों में पनपती हिंसक प्रवृत्ति दिनों-दिन चिंता का सबब बनती जा रही है। लंबे समय से इसे लेकर मंथन चल रहा है कि आखिर बच्चों का ऐसा मानस बन कैसे रहा है और इस पर नकेल कसने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं। ज्यादातर अध्ययनों की सुई इलेक्ट्रानिक उपकरणों पर बच्चों के अधिक समय बिताने और इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री में रमे रहने पर जाकर टिक जाती है। बच्चों के भीतर वही हिंसा की जड़ें रोपते हैं।

इसका ताजा उदाहरण लखनऊ के एक बच्चे का अपनी मां को सिर्फ इसलिए मार डालना है कि वह उसे इंटरनेट पर खेलने से रोकती थी। बच्चे को पबजी खेलने की लत थी। मां ने रोका तो बच्चे ने उसे गोली मार दी और दो दिनों तक उसकी लाश को एक कमरे में बंद रखा। फिर फौज में तैनात अपने पिता को बताया।

हालांकि यह कोई पहली घटना नहीं है। कई ऐसे मामले हो चुके हैं, जिनमें किशोरों ने अपनी दादी-नानी, दादा-नाना को जान से मार कर पैसा हड़पने का प्रयास किया और अपने शौक पूरे किए। स्कूलों में सहपाठियों पर हिंसक हमले, अपहरण कर फिरौती मांगने आदि की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इंटरनेट की सामग्री से प्रभावित होकर लूटपाट करने और जान से मार देने तक की घटनाएं हुई हैं।

पिछले कुछ सालों से किशोरों में नशे की बढ़ती लत को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। नशे की गिरफ्त में आए बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और वे हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। अपने माता-पिता से हिंसक बर्ताव करने लगते हैं। मगर सबसे भयावह लत इंटरनेट पर खेले जाने वाले खेलों की लगी है।

इंटरनेट पर कई ऐसे खेल आए, जिनकी लत के शिकार बच्चों ने खुदकुशी कर ली या किसी की जान ले ली। तमाम अध्ययनों से जाहिर है कि ज्यादा समय मोबाइल फोन या कंप्यूटर पर खेलने में बिताने की वजह से बच्चों के शरीर और मन पर बुरा असर पड़ रहा है। दुनिया भर में इस लत का इलाज करने के लिए अस्पतालों में अलग से विभाग खोल दिए गए हैं। मगर इस लत में कमी के बजाय बढ़ोतरी ही दर्ज हो रही है।

इसका एक कारण तो यह बताया जाता है कि कोरोना संकट के समय जब स्कूल बंद थे, तो बच्चों को इंटरनेट के जरिए कक्षाएं लेना मजबूरी हो गई थी। इस वजह से माता-पिता ने उन्हें स्मार्ट फोन दे दिए। मगर मोबाइल अब महज संचार उपकरण नहीं, एक घातक हथियार का रूप लेता गया है।

इंटरनेट पर अथाह सामग्री पड़ी हुई है। उस सामग्री का इस्तेमाल हर कोई अपने ढंग से कर रहा है। मगर किशोर वय के लोगों को वही सामग्री अधिक आकर्षित करती है, जो सामान्यतया समाज में वर्जित है। अब वे उसका इस्तेमाल करने को स्वतंत्र हैं। इसकी वजह से उनमें हिंसक प्रवृत्तियां पनप रही हैं।

इस समस्या को देखते हुए दुनिया भर में चर्चा चलती रही है कि कैसे आपत्तिजनक, बाल और किशोर मन पर बुरा असर डालने वाली सामग्री की उपलब्धता रोकी जाए। जब किसी खेल की वजह से कोई बड़ी घटना हो जाती है, तो सरकारें उस पर रोक लगा देती हैं। मगर पूरी तरह ऐसी सामग्री को रोका जा सके, इसका उपाय अभी तक नहीं निकाला जा सका है। जब तक ऐसा नहीं हो पाता, बच्चों और किशोरों के मन में जड़ें जमाती हिंसक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना कठिन ही बना रहेगा।

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