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ताउते का कहर

चक्रवाती तूफान से अरबों-खरबों का नुकसान होना जाहिर-सी बात है। ऐसी आपदाओं में लोगों को जो खोना पड़ता है, उसे फिर से जुटाने में वक्त लगता है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी आपदाओं का सबसे ज्यादा शिकार भी गरीब ही होता है। छोटे-मोटे काम करने वाले अधिसंख्य लोग ऐसी आपदाओं में काफी कुछ खो बैठते हैं।

पिछले चार सालों में मानसून से पहले अरब सागर में एक के बाद एक आने वाला लगातार चौथा चक्रवात है ताउते। (Picture by Nitin R.K.)

चक्रवात ताउते गोवा से लेकर कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय इलाकों में भारी तबाही मचाता हुआ निकल गया है। अब तक पैंतालीस लोगों के मारे जाने की खबर है। हालांकि अब यह कमजोर पड़ चुका है। लेकिन यह अपने पीछे बर्बादी के जो भयानक मंजर छोड़ गया है, उनसे उबरने में वक्त लगेगा। फिलहाल सबसे बड़ी चिंता मुंबई हाई के पास गहरे समंदर में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने की है। पिछले दो दिन में नौसेना और तटरक्षक के पोत और हेलिकॉफ्टर तीन सौ से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाल चुके हैं। बाईस लोगों के शव मिल चुके हैं। पर अभी भी बाकी पैंसठ लोगों की कोई खबर नहीं मिली है। ये सब वे लोग हैं जो मुंबई हाई के तेल के कुओं पर काम करते हैं और वहीं जहाजों, जो बजरे कहलाते हैं, में रहते हैं। जब ये बजरे ताउते की चपेट में आ गए तो इनसे लोगों को सुरक्षित निकलना नौसेना और तटरक्षक के लिए भी कठिन चुनौती बन गया। हालांकि नौसेना के पोत अत्याधुनिक तकनीक और सुरक्षा उपकरणों से युक्त होते हैं और बड़े-बड़े तूफानों को झेलने की ताकत रखते हैं। लेकिन कुदरत के कहर का अंदाजा किसी को नहीं होता।

चक्रवाती तूफान से अरबों-खरबों का नुकसान होना जाहिर-सी बात है। ऐसी आपदाओं में लोगों को जो खोना पड़ता है, उसे फिर से जुटाने में वक्त लगता है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी आपदाओं का सबसे ज्यादा शिकार भी गरीब ही होता है। छोटे-मोटे काम करने वाले अधिसंख्य लोग ऐसी आपदाओं में काफी कुछ खो बैठते हैं। तटीय इलाकों में रहने वालों की आजीविका मछली पालन, नारियल की खेती और पर्यटन आदि पर ही निर्भर होती है। आसपास के ज्यादातर घर भी कच्चे ही होते हैं। ऐसे में तूफानी लहरों से क्षण भर में ही सब कुछ छिन जाता है। तूफानी हवा से हजारों पेड़ और बिजली के खंभे धराशायी हो जाते हैं। इससे बिजली और संचार व्यवस्थाएं ठप हो जाना लाजिमी है। कई बार लोग भी जान गंवा बैठते हैं। पर यह भी सच है कि भयानक तूफानों में यह सब होने से रोका नहीं जा सकता। इसलिए अब वक्त संकट से निकलने का है और सरकारों व प्रशासन को राहत के काम तेजी से करने होंगे।

तूफान का सबसे ज्यादा कहर महाराष्ट्र और गुजरात पर ही बरपा है। गुजरात के अमरेली, गिर सोमनाथ, पोरबंदर, राजकोट, भावनगर जैसे तटीय जिलों में हुई तबाही ताउते की ताकत को बताने के लिए काफी है। मुंबई भी तूफानी लहरों और हवाओं से हिल गया। हालांकि तूफान का असर व्यापक रूप से उत्तर भारत के कई हिस्सों में पड़ा है और अचानक बना बारिश का मौसम इसी का परिणाम है।

भारत के तीन तरफ महासागर हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर ओड़ीशा, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात का बड़ा हिस्सा समुद्री तटों वाला है। ऐसे में हर साल किसी न किसी बड़े तूफान की मार झेलनी पड़ जाती है। पर अच्छी बात यह है कि तूफान पूर्व की चेतावनियों से लोगों की जान बचा पाना अब संभव बन गया है। भारत के पास मौसम संबंधी जानकारी देने वाले उपग्रह हैं।

इसलिए अब इतना तो संभव हो गया है कि तूफान आने से पहले ही लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। तूफानों में फंसे लोगों को निकालने में हमारी नौसेना और तटरक्षक सक्षम हैं। आपदा प्रबंधन दल तत्काल स्थिति को संभाल लेते हैं। बेशक समुद्री तटों पर तूफान का खतरा प्रकृति प्रदत्त है। इसे रोक पाना संभव नहीं है। पर पीड़ितों के जख्मों को जल्द से जल्द कैसे भरें, इसकी हर मुमकिन कोशिश जरूर होना चाहिए।

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