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व्यवस्था का संकट

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद ऑक्सीजन की कमी के मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारें हरकत में आईं। उत्पादन बढ़ाने और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ने की बात भी कही जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि ऑक्सीजन की फौरी जरूरत कैसे पूरी हो?

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कई राज्यों की ओर से ऑक्सीजन की कमी की शिकायत दर्ज की जा रही है। (Indian Express)।

अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी और आग जैसे हादसे मरीजों की मौत का बड़ा कारण बनने लगें तो यह बहुत ही अफसोस की बात है। ज्यादा चिंता की बात तो यह है कि पिछले दिनों ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं। हालांकि ऑक्सीजन की कमी और अस्पतालों में आग की घटनाएं दोनों अलग मामले हैं। लेकिन दोनों मामलों में पीड़ित तो मरीज ही हैं।

सवाल है कि अस्पतालों में होने वाली ऐसी अकाल मौतों के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाए। अस्पताल प्रशासन, सरकार या फिर वे दूसरे नियामक जिन पर अस्पतालों के प्रबंधन से लेकर हर बात पर निगरानी रखने की जिम्मेदारी बनती है। चौबीस घंटे में तीन ऐसी घटनाएं सामने आईं जो व्यवस्था के रवैए पर सवाल खड़े करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि पिछले एक साल में अस्पतालों पर दबाव काफी बढ़ा है, लेकिन मरीजों की सुरक्षा तो सर्वोपरि है। ताजा मामला दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल है जहां चौबीस घंटे में पच्चीस कोरोना मरीजों की मौत हो गई। जैसा कि बताया जा रहा है कि ये सभी पच्चीस मरीजों आॅक्सीजन की कमी का शिकार हुए। मध्य प्रदेश के जबलपुर में भी एक अस्पताल में आॅक्सीजन खत्म हो जाने पांच लोगों ने दम तोड़ दिया। उधर, मुंबई एक अस्पताल में आग से फिर तेरह लोगों की मौत हो गई।

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद ऑक्सीजन की कमी के मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारें हरकत में आईं। उत्पादन बढ़ाने और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। ऑक्सीजन की कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ अभियान छेड़ने की बात भी कही जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि ऑक्सीजन की फौरी जरूरत कैसे पूरी हो? जिस मरीज को ऑक्सीजन की जरूरत है वह तो कुछ मिनट भी इसका इंतजार नहीं कर सकता।

अगर जरूरतमंदों को समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल पा रही है तो इसके लिए सीधे तौर पर सरकारों को जिम्मेदार माना जाना चाहिए। यह ठीक है कि ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाने, भरे सिलेंडरों को देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचाने और फिर अस्पतालों में आपूर्ति का इंतजाम रातों-रात नहीं हो सकता। लेकिन सरकारें इस तरह के तर्क देकर बच तो नहीं सकतीं! कैसे भी हो, उन्हें जल्द से जल्द से ये इंतजाम करने ही होंगे।

मुंबई के अस्पताल में आग कोई सामान्य घटना नहीं है। कुछ ही दिनों के भीतर अस्पतालों में आग का यह तीसरा हादसा है। इस बार फिर एक कोविड अस्पताल में आग की घटना में तेरह लोगों की मौत हो गई। कारण बताया जा रहा है कि अस्पताल के वातानुकूलन संयंत्र में चिंगारी की वजह से आग लगी। सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं। मृतकों के परिजनों को मुआवजे का एलान भी कर दिया गया है। लेकिन इससे इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता कि ऐसे हादसों की जिम्मेदारी किस पर डाली जाए?

ऐसे हादसों को रोकने के लिए जिम्मेदार लोगों को चौकस को करना ही पड़ेगा। पिछली घटनाओं से अगर सबक लिया जाता तो यह दिन नहीं देखना पड़ता। भले ही इस हादसे में तेरह लोगों की मौत हुई हो, लेकिन मौतों के आंकड़े को छोटा या बड़ा मानना ठीक नहीं है। हर जीवन अमूल्य होता है। इसलिए जीवन की सुरक्षा सरकारों का पहला दायित्व बनता है। ऑक्सीजन की कमी हो या आग की घटनाएं, हम देख रहे हैं कि हमारा व्यवस्था तंत्र निष्ठुर बन चुका है।

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