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आरक्षण और योग्यता

आरक्षण कई वजहों से अवसरों और अधिकार से वंचित रह गए तबकों को सामाजिक न्याय मुहैया कराने की एक व्यवस्था है, वह कई वजहों से राजनीति के दांवपेच में उलझता रहा है। अब शीर्ष अदालत के ताजा रुख के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मसले पर विचार और बहसों में एक स्पष्टता आ पाएगी।

Supreme Court, SC expresses disapproval, NCDRC, Home buyers dispute case, for 11 months adjourning
भारत का उच्चतम न्यायालय। फोटो (स्रोत- एएनआई)

काफी जद्दोजहद के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्नातक और स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश (नीट) परीक्षा के माध्यम से होने वाले दाखिले में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की अनुमति दे दी है। अदालत से साफतौर पर कहा है कि नीट-पीजी और यूजी प्रवेश के लिए अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण मान्य है।

इसका मतलब यह है कि चिकित्सकों की भर्ती में होने वाले देरी को लेकर जो चिंता जताई जा रही थी, अब वह प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इस फैसले के साथ नीट-पीजी में दाखिले की बाधित राह खुली है, लेकिन ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्गों यानी ईडब्लूएस के लिए आरक्षण को लेकर शीर्ष अदालत का जो स्पष्ट रुख सामने आया है, वह इस मसले पर चल रही कई बहसों के लिए एक तरह से जरूरी जवाब भी है। अदालत के मुताबिक, अनुच्छेद 15(4) और 15(5) हर देशवासी को मौलिक समानता देते हैं। साथ ही प्रतियोगी परीक्षाएं उत्कृष्टता, व्यक्तियों की क्षमताओं को नहीं दर्शाती हैं। ऐसे में कुछ वर्गों को मिलने वाले सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लाभ को प्रतिबिंबित नहीं किया जा सकता।

दरअसल, उच्च शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के संदर्भ में एक आम प्रचलित दलील यह रही है कि इससे योग्यता के सिद्धांत का हनन होता है। लेकिन योग्यता बरक्स आरक्षण का तर्क जितना सिर्फ सतह पर मौजूद धारणाओं पर निर्भर रहा है, उससे ज्यादा यह समाज में पलते-बढ़ते बहुस्तरीय आग्रहों से संचालित होता रहा है।

सच यह है कि देश में नौकरियों या उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण एक ऐसी विशेष व्यवस्था रूप में लागू की गई, जिसके जरिए समाज में कई वजहों से पिछड़ गए तबकों को उनके वाजिब अधिकार दिलाने के लिए सशक्तिकरण की एक अहम प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है। यों भी एक लोकतांत्रिक और सभ्य समाज और उसका सक्षम हिस्सा अपने बीच के वंचित वर्गों को उनके अधिकार दिलाने के लिए अपनी ओर से पहल करता है। इस मसले पर हमारे देश में जमीनी स्तर पर समाज की हकीकत और सार्वजनिक जीवन में वस्तुस्थिति को नजरअंदाज करके आरक्षण पर सवाल उठाए जाते रहे हैं।

इस लिहाज से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने नीट-पीजी में आरक्षण के सवाल पर जो राय जाहिर की है, वह ऐसी कई बहसों को दिशा दे सकती है। अदालत ने खासतौर पर योग्यता और आरक्षण की बहस को यह कह कर स्पष्ट किया है कि आरक्षण किसी भी तरह से योग्यता के विपरीत नहीं है, बल्कि यह इसके वितरण प्रभाव को आगे बढ़ाता है। यही नहीं, अगर खुली प्रतियोगी परीक्षाएं अभ्यर्थियों को प्रतिस्पर्धा के समान मौका मुहैया कराती हैं, वहीं आरक्षण यह सुनिश्चित करता है कि अवसरों को इस तरह से वितरित किया जाए, ताकि पिछड़ गए वर्ग ऐसे अवसरों से समान रूप से लाभान्वित हो सकें जो आमतौर पर संरचनात्मक बाधाओं के कारण इससे छूट जाते हैं।

यों आरक्षण के संदर्भ में होने वाली बहसों में यह भी कहा जाता रहा है कि योग्यता को सामाजिक संदर्भों में परिभाषित किया जाना चाहिए। इसके समांतर राज्य की ओर से वंचित वर्गों के लिए न्याय सुनिश्चित किए जाने के प्रयासों के तहत आरक्षण समाज में बराबरी स्थापित करने के एक अहम औजार के तौर पर काम करता है।

विडंबना यह है कि जो आरक्षण कई वजहों से अवसरों और अधिकार से वंचित रह गए तबकों को सामाजिक न्याय मुहैया कराने की एक व्यवस्था है, वह कई वजहों से राजनीति के दांवपेच में उलझता रहा है। अब शीर्ष अदालत के ताजा रुख के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि इस मसले पर विचार और बहसों में एक स्पष्टता आ पाएगी।

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