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सतर्कता के साथ

अभी पक्के तौर पर यह दावा करना सही नहीं होगा कि खतरा टल गया है। खतरा अभी कम भर हुआ है। यानी जोखिम बरकरार है। इस वक्त हम ऐसे नाजुक मोड़ पर हैं जिसमें अब जरा-सी भी लापरवाही एक बार फिर तबाही के रास्ते पर धकेल सकती है। इसलिए अब जो राज्य बंदिशों में ढील दे रहे हैं, उन्हें फूंक-फूंक कर कदम उठाने होंगे।

दिल्ली में एक सप्ताह के लिए लॉकडाउन बढ़ाया गया (फोटो- PTI)

कई हफ्तों की बंदी के बाद देश के कुछ राज्यों ने अब इसमें ढील देने की कवायद शुरू कर दी है। ढील देने का काम चरणबद्ध तरीके से होगा। माना जा रहा है कि ज्यादातर जगहों पर संक्रमण के मामलों में अब काफी कमी आ गई है। राजधानी दिल्ली में तो संक्रमण दर डेढ़ फीसद से भी कम है। उत्तर प्रदेश में भी यह उतार पर ही है। लेकिन अभी पक्के तौर पर यह दावा करना सही नहीं होगा कि खतरा टल गया है। खतरा अभी कम भर हुआ है। यानी जोखिम बरकरार है। इस वक्त हम ऐसे नाजुक मोड़ पर हैं जिसमें अब जरा-सी भी लापरवाही एक बार फिर तबाही के रास्ते पर धकेल सकती है। इसलिए अब जो राज्य बंदिशों में ढील दे रहे हैं, उन्हें फूंक-फूंक कर कदम उठाने होंगे।

हाल ही में गुजरे दौर को पलट कर देखना जरूरी है। दूसरी लहर ने जिस तरह से कहर बरपाया, उसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। पिछले पखवाड़े संक्रमितों का रोजाना आंकड़ा चार लाख के ऊपर निकल गया था। इसी के बाद देश को एक बार फिर से बंदी जैसे सख्त प्रतिबंधों की मार झेलने को मजबूर होना पड़ा। विषाणु का फैलाव रोकने के लिए राज्यों के पास इसके अलावा कोई चारा भी नहीं रह गया था। लेकिन सवाल यह है कि जीवन को आखिर कब तक इस तरह कैद रखा जा सकता है? काम-धंधे नहीं चलेंगे तो लोग भूखे मरने लगेंगे। कर्ज में डूबते जाएंगे। कारोबार ठप होने लगेंगे।

यह सब पिछले साल भी हम भुगत ही चुके हैं। इसलिए हालात को देखते हुए सरकारें भी मजबूरी को समझ रही हैं। बस देखने की बात यह है कि कौनसा राज्य कितनी छूट देता है और कितने बेहतर ढंग से महामारी के हालात और काम-धंधे के बीच तालमेल बना कर आगे बढ़ पाता है।

गौरतलब है कि सभी राज्यों की बड़ी चिंता छोटे उद्योगों धंधों को लेकर ज्यादा है। क्योंकि राज्यों की आमदनी का बड़ा हिस्सा इनसे मिलने वाले करों से आता है। इसलिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र ने आम जनजीवन को पटरी पर लाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। राजधानी दिल्ली में फिलहाल निर्माण कार्यों और फैक्ट्रियों में उत्पादन को छूट दी गई है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों ने सीमित संख्या में दुकानें खोलने की इजाजत देने का फैसला किया है। मध्य प्रदेश में ढील का दायरा इसी के इर्दगिर्द रहेगा। यह सही भी है क्योंकि ज्यादा ढील या एक साथ सब कुछ खोल देना नए खतरे को न्योता देने जैसे होगा।

बंदी में ढील के बाद के जोखिम भी कम नहीं हैं। क्योंकि पिछली बार एक साथ बाजार खोल देने से भीड़ बढ़ने लगी थी। इससे अब सबक लेना चाहिए। बारी-बारी से बाजारों को खोलने के दिन और समय निर्धारित करना जरूरी है, ताकि भीड़ न बढ़े। मुश्किल तो है ही, क्योंकि लोगों को महामारी से भी बचाना है और अर्थव्यवस्था को भी रास्ते पर लाना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि दूसरी लहर के तांडव से लोगों में डर तो बना है और यह डर फिजूल का भी नहीं है। इसलिए लोग खुद भी काफी कुछ चिंतित और सतर्क तो हैं। इधर सरकारें भी चाह रही हैं कि लोग बचाव के लिए बनाए गए नियमों का पालन करें। अगर लापरवाही या चूक हुई तो महामारी से जंग जीतना मुश्किल हो जाएगा।

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