संक्रमण के दायरे

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कोरोना के भयावह दौर में सबसे ज्यादा चिकित्साकर्मी ही जूझे हैं। संक्रमितों के सबसे ज्यादा संपर्क में आने का जोखिम भी इन्हीं को उठाना पड़ता है। ऐसे में अगर इनके संक्रमित होने की रफ्तार नहीं थमी तो स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ सकता है।

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एक बीएमसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता कोविड-19 परीक्षण करता हुआ(फोटो सोर्स: PTI)।

देश में कोरोना मरीजों का रोजाना का आंकड़ा एक बार फिर एक लाख के पार निकल गया। ओमीक्रान के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच एक और बात है जिसने चिंता बढ़ा दी है, वह यह कि अब बड़ी संख्या में हमारे चिकित्साकर्मी भी संक्रमित हो रहे हैं। महाराष्ट्र में इसी हफ्ते चार सौ के लगभग रेजीडेंट डाक्टर संक्रमित हो गए।

देश के प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में गिने जाने वाले चंडीगढ़ के पीजीआइ में एक सौ छियानवे चिकित्साकर्मी संक्रमित मिले। कोलकाता के नेशनल मेडिकल कालेज अस्पताल में दो सौ से ज्यादा डाक्टर संक्रमण की चपेट आ गए, जबकि पूरे महानगर में यह आंकड़ा चार सौ के आसपास बताया गया है। बिहार के नालंदा जिले के मेडिकल कालेज में अस्पताल में कई डाक्टर और छात्र संक्रमित हो गए। ऐसी ही हालत देश दूसरे अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में है। हालात जिस तरह से बिगड़ रहे हैं, उसे देखते हुए अगर ये आंकड़े और बढ़ते जाएं तो हैरानी नहीं होगी।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कोरोना के भयावह दौर में सबसे ज्यादा चिकित्साकर्मी ही जूझे हैं। संक्रमितों के सबसे ज्यादा संपर्क में आने का जोखिम भी इन्हीं को उठाना पड़ता है। ऐसे में अगर इनके संक्रमित होने की रफ्तार नहीं थमी तो स्वास्थ्य सेवाओं पर असर पड़ सकता है। क्योंकि अगर एक बार सामान्य संक्रमण भी किसी को जकड़ ले रहा है तो उसे ठीक होने में कम से कम पंद्रह दिन लग जाते हैं। यदि हालत ज्यादा खराब हो जाए तो और वक्त या महीने भी लग जाते हैं।

पिछले दो साल में हमने देखा कि स्वास्थ्यकर्मियों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है। स्वास्थ्यकर्मियों को बिना किसी अवकाश के कई-कई दिनों तक काम करना पड़ रहा है। चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे जूनियर और सीनियर छात्र-डाक्टर दो-दो-तीन-तीन दिन तक लगातार संक्रमितों के बीच मोर्चा संभाले हुए हैं। स्वास्थ्यकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन्हें संक्रमितों के बीच रह कर काम भी करना है और अपने को बचाना भी है।
दूसरी लहर में भारत में सात सौ ज्यादा चिकित्सकों की जान गई थी।

इनमें सबसे ज्यादा एक सौ तीस डाक्टर बिहार के और एक सौ नौ दिल्ली के थे। उत्तर प्रदेश में भी अस्सी के आसपास डाक्टर कोरोना संक्रमण के कारण मारे गए थे। ऐसे में सवाल फिर यही है कि स्वास्थ्यकर्मियों को महामारी की जद में आने से बचाया कैसे जाए। देश में पिछले साल जनवरी में जब टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब सबसे पहले टीका स्वास्थ्यकर्मियों को ही दिया था। उसके पीछे मकसद यही था कि इन्हें संक्रमितों के बीच रह कर काम करना है, इसलिए इन्हें विषाणु से प्रतिरक्षा देना सबसे जरूरी है।

हालांकि देखने में यह भी आता ही रहा है कि ज्यादातर अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों को बचाव के लिए जरूरी संसाधन यानी पीपीई किटों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। एक ही मास्क या किट को लंबे समय तक या कई दिन तक चलाने की मजबूरी हो जाती है।

कुछ जगहों पर तो काम का इतना ज्यादा दबाव है कि संक्रमित चिकित्साकर्मियों के लिए एकांतवास की अवधि भी घटा दी गई है और उन्हें तत्काल काम पर बुला लिया जाता है। जरूरत इस बात की है कि स्वास्थ्यकर्मियों को निर्धारित मानकों वाले बचाव के पूरे साधन मिलें। मौजूदा हालात इस बात की भी जरूरत बता रहे हैं कि हमें स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मियों की संख्या भी बढ़ानी होगी। तभी हम महामारी से निपट पाएंगे।

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