पाक की मनमानी

दरअसल, पाकिस्तान आतंकवाद के रास्ते पर जितना आगे निकल चुका है वहां से उसका लौटना आसान नहीं है। पाकिस्तानी हुक्मरानों में न तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति है और न ही आइएसआइ और सेना

Imran Khan
पाकिस्तान पर 3 साल पहले तक 24.95 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज था। इमरान सरकार ने 3 साल में 14.9 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज फिर लिया। (AP Photo/File)

वित्तीय कार्रवाई बल (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान को कोई राहत न देकर एक बार फिर कड़ा संदेश दिया है कि जब तक वह आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाता, तब तक उसे निगरानी सूची में ही रखा जाएगा। एफएटीएफ ने पिछले तीन साल से भी ज्यादा समय से पाकिस्तान को निगरानी सूची में डाल रखा है। इस कारण उस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगे हुए हैं। आतंकवाद के खात्मे के लिए एफएटीएफ ने पाकिस्तान को चौंतीस सूत्रीय एजेंडा दिया है, जिसके तहत उसे अपने यहां आतंकवादी संगठनों और उनके सरगनाओं के खिलाफ कदम उठाने हैं।

साथ ही, उन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी है, जो आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए आतंकी संगठनों को पैसे सहित हर तरह से भरपूर मदद दे रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि एफएटीएफ की सख्ती के बावजूद तीन साल में भी पाकिस्तान ने ऐसा कुछ करके नहीं दिखाया, जिससे थोड़ा भी यह भरोसा बनता हो कि वह आतंकवाद के खिलाफ जंग को लेकर वाकई गंभीर है। इससे तो लगता है कि पाकिस्तान को एफएटीएफ की कार्रवाई की कोई परवाह नहीं है। न ही दुनिया के तमाम देशों के दबाव का उस पर कोई असर पड़ रहा है।

गौरतलब है कि एफएटीएफ समय-समय पर होने वाली अपनी बैठकों में पाकिस्तान को चेताता रहा कि आतंकवाद से निपटने के लिए वह उसके एजेंडे पर चले और निर्धारित मानदंडों को पूरा करे। इस साल फरवरी में भी एफएटीएफ की बैठक में पाकिस्तान को लेकर समीक्षा की गई थी, पर पाया गया कि आतंकवाद पर लगाम की दिशा में पाकिस्तान ने ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे उसे निगरानी सूची से बाहर निकालने के बारे में विचार किया जाए।

पाकिस्तान ने वित्तीय कार्यबल के जिन कार्यों को पूरा नहीं किया है उनमें जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल होना भी शामिल हैं। न ही वह आतंकी संगठनों को पैसा मुहैया कराने वाले स्रोतों पर लगाम कस रहा है। कहना न होगा कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है। देश में महंगाई से लेकर विदेशी कर्ज का पहाड़ उस पर है। आर्थिक मदद के सारे रास्ते बंद हैं। एफएटीएफ की निगरानी सूची में होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से मदद भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में भी अगर पाकिस्तान के हुक्मरान आतंकवाद से निपटने में कोई कदम नहीं उठा रहे तो साफ है कि वे ऐसा करना ही नहीं चाहते।

दशकों तक पाकिस्तान के हमदर्द रहे अमेरिका तक ने उसे वैश्विक आतंकी कहने से परहेज नहीं किया, तो इसके पीछे कुछ ठोस कारण रहे होंगे। अमेरिका या दुनिया के किसी भी देश को अब इस बारे में सबूतों की कोई जरूरत नहीं रह गई है कि पाकिस्तान में आतंकवाद एक संगठित कारोबार का रूप ले चुका है और इसमें उसकी सेना, खुफिया एजेंसी आइएसआइ बराबर की भागीदार है।

वरना कैसे अलकायदा सरगना उसामा बिन लादेन पाकिस्तान की शरण में रह पाता, जिसे अमेरिका ने वहीं जाकर मारा? लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के सरगना कैसे पाकिस्तान में सुरक्षित बैठे हैं? दरअसल, पाकिस्तान आतंकवाद के रास्ते पर जितना आगे निकल चुका है वहां से उसका लौटना आसान नहीं है। पाकिस्तानी हुक्मरानों में न तो इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति है और न ही आइएसआइ और सेना उन्हें ऐसा करने देगी।

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