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हाशिये पर स्त्रियां

जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोजित उथल-पुथल होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है। महामारी के संकट में भी स्त्रियां ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं।

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कोविड-19 के चलते बहुत सारी महिलाओं को अपना रोजगार बीच में ही छोड़ देना पड़ा। गुजरात के सूरत में दो हजार का नोट दिखाती एक महिला। (फोटो सोर्स- पीटीआई )

अमूमन हर दौर में किसी भी संकट, युद्ध या मनुष्यजनित समस्या का सबसे बड़ा खमियाजा महिलाओं और बच्चों को उठाना पड़ा है। पिछले साल भर से चल रहे महामारी के दौर में इससे बचाव के लिए जो उपाय अपनाए गए, उसमें पूर्णबंदी और दूसरे सख्त नियम-कायदों की वजह से दुनिया भर में बहुत सारे क्षेत्र ठप पड़ गए या अस्त-व्यस्त हो गए। अब जब महामारी का जोर कम होता दिख रहा है, तो ऐसे में विश्व के तमाम देशों सहित भारत भी इससे उबरने की कोशिश में है।

ऐसे में अर्थव्यवस्था को पहले जैसी रफ्तार में लाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसलिए पूर्णबंदी में जो क्रमश: राहत दी जा रही है, उसमें धीरे-धीरे बाजार और आम गतिविधियां सामान्य होने की ओर अग्रसर हैं। लेकिन इस बीच एक बड़ी चिंता यह खड़ी हुई है कि पिछले कुछ दशकों में स्त्रियों ने सार्वजनिक जीवन में भागीदारी से लेकर अर्थव्यवस्था के मोर्चे तक पर जो मुकाम हासिल किया था, उसमें तेज गिरावट आई है। हालत यह है कि रोजगार या नौकरी का जो क्षेत्र स्त्रियों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया रहा, उसमें इनकी भागीदारी का अनुपात बेहद चिंताजनक हालात में पहुंच चुका है।

गौरतलब है कि बबल एआइ की ओर से इस साल जनवरी से पिछले दो महीने के दौरान कराए गए सर्वेक्षण में ये तथ्य उजागर हुए हैं कि महिलाओं को कई क्षेत्रों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारतीय संदर्भों में रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 के चलते बहुत सारी महिलाओं को अपना रोजगार बीच में ही छोड़ देना पड़ा। इसने श्रम क्षेत्र में महिलाओं की पहले से ही कम भागीदारी को और कम कर दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यस्थलों पर इकहत्तर फीसद कामकाजी पुरुषों के मुकाबले महिलाएं महज ग्यारह फीसद रह गई हैं। जाहिर है, बेरोजगारी के आंकड़े भी इसी आधार पर तय होंगे। इसके मुताबिक, महिलाओं के बीच बेरोजगारी की दर पुरुषों में छह फीसद के मुकाबले सत्रह फीसद हो गई। इसमें शक नहीं कि सामाजिक परिस्थितियों में महिलाओं को रोजाना जिन संघर्षों का सामना करना पड़ता है, उसमें अब भी उनके हौसले बुलंद हैं। मगर सच यह भी है कि बहुत मुश्किल से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाने के बाद अचानक नौकरी और रोजगार गंवा देने का सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है और वे उससे भी जूझ रही हैं।

यों जब भी किसी देश या समाज में अचानक या सुनियोजित उथल-पुथल होती है तो उसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर स्त्रियों पर पड़ता है। महामारी के संकट में भी स्त्रियां ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुईं। ताजा सर्वे में नौकरियों और रोजगार के क्षेत्र में उन पर आए संकट पर चिंता जताई गई है। इससे पहले ऐसी रिपोर्ट आ चुकी है कि कोरोना की वजह से लगाई गई पूर्णबंदी के चलते महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई। सवाल है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है, जिनमें हर संकट की मार महिलाओं को ही झेलनी पड़ती है!

दरअसल, इस तरह के हालात की वजह सामाजिक रही है। सोपान आधारित पितृसत्तात्मक समाज-व्यवस्था में आमतौर पर सत्ता के केंद्र पुरुष रहे और श्रम और संसाधनों के बंटवारे में स्त्रियों को हाशिये पर रखा गया। सदियों पहले इस तरह की परंपरा विकसित हुई, लेकिन अफसोस इस बात पर है कि आज जब दुनिया अपने आधुनिक और सभ्य होने का दावा कर रही है, उसमें भी इसके ज्यादातर हिस्से में स्त्रियों को संसाधनों में वाजिब भागीदारी का हक नहीं मिल सका है। इसका असर हर संकट के दौर में देखने में आता है जब सभी वंचनाओं की गाज स्त्रियों पर गिरती है।

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