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अमन का रास्ता

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सैन्य तैनाती में कोई कटौती नहीं करेगा। फिर आतंकवाद को वित्तपोषण रोकने के लिए उस पर लगे प्रतिबंध जारी रहेंगे। यानी पाकिस्तान पर कसे बाकी शिकंजे बरकरार रहेंगे।

International border, truceभारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर चौकसी करते भारतीय जवान। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा सहित तमाम जगहों पर संघर्ष विराम संबंधी समझौतों पर सख्ती से अमल को लेकर बनी सहमति से स्वाभाविक ही दोनों देशों के रिश्तों में सुधार की उम्मीद जगती है। गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तानी सेना ने जिस तरह संघर्ष विराम समझौतों का अंधाधुंध उल्लंघन किया, उसे लेकर चौतरफा निंदा हो रही थी। भारत के लिए हर समय अपने सुरक्षा बलों को सतर्क रखना पड़Þ रहा था। सीमा पार से बेवजह और बिना किसी उकसावे के गोलीबारी में सीमावर्ती इलाकों के बहुत सारे बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। बहुतों के घर नष्ट हो गए।

उन्हें अपने खेतों में काम करने जाने को लेकर लगातार भय का सामना करना पड़ता है। पाकिस्तानी सेना की इस मनमानी पर रोक लगाने के लिए भारत अनेक मौकों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गुहार लगा चुका था, मगर इस पर रोक नहीं लग पा रही थी। अब भारतीय और पाकिस्तानी सैन्य अभियान के महानिदेशकों की बैठक में सहमति बनी है कि दोनों देश संघर्ष विराम समझौतों का कड़ाई से पालन करेंगे। अगर पाकिस्तान सचमुच इसे लेकर गंभीर है, तो आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच दूसरे मुद्दों पर पैदा मतभेदों को सुलझाने की पहल की उम्मीद भी की जा सकती है।

हालांकि अभी तक पाकिस्तानी सेना के रुख को देखते हुए इस बारे में कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि वह ताजा सहमति को कहां तक निभा पाएगा। छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तानी सेना संघर्ष विराम का उल्लंघन इसलिए करती रही है कि उसे अपनी तरफ से दहशतगर्दों को कश्मीर घाटी में घुसपैठ करानी होती है। उसने यह रास्ता छोड़ दिया है, कहना मुश्किल है। जबसे कश्मीर से अनुच्छेद तीन सौ सत्तर समाप्त हुआ है, पाकिस्तानी हुक्मरान, सेना और चरमपंथी संगठनों में खासी बेचैनी देखी गई है।

यह भी छिपी बात नही है कि वहां की सेना पर राजनीतिक अंकुश बहुत कमजोर है। सेना, खुफिया एजेंसी और चरमपंथी संगठनों का तंत्र मिल कर भारत को अस्थिर करने की कोशिश में लगे रहते हैं। कश्मीर मसले पर पाकिस्तान ने चुप्पी साधना बेहतर समझा है या उसे भारत का अंदरूनी मामला मान लिया है, ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। इसलिए वह कब अपनी रजामंदी तोड़ कर पुराने रास्ते पर लौट पड़े, कहना मुश्किल है। फिलहाल उसके इस पर सहमत होने की कुछ वजहें समझी जा सकती हैं।

एक तो यह कि भारत के साथ तनातनी में उसके बहुत सारे कारोबार प्रभावित हुए हैं, इसलिए वह रिश्तों में कुछ बेहतरी लाकर उन्हें पटरी पर लौटाना चाहता है। फिर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की नजरों में वह अपना नरम रुख जाहिर करना चाहता है।

हालांकि इस समझौते का यह अर्थ कतई नहीं है कि पाकिस्तान की तरफ भारत अपनी चौकसी कम कर लेगा। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सैन्य तैनाती में कोई कटौती नहीं करेगा। फिर आतंकवाद को वित्तपोषण रोकने के लिए उस पर लगे प्रतिबंध जारी रहेंगे। यानी पाकिस्तान पर कसे बाकी शिकंजे बरकरार रहेंगे।

अब गेंद पाकिस्तान के पाले में है कि वह इस समझौते को रिश्ते सुधारने की दिशा में पहला कदम मान कर आगे बढ़ने का प्रयास करता है या फिर पुराने रास्ते पर लौटना चाहता है। अगर वह सचमुच भारत के साथ संबंध बेहतर बनाना चाहता है तो उसे सबसे पहले दहशतगर्दी पर नकेल कसने के लिए गंभीरता से रणनीति बनानी होगी। दोनों देशों के बीच रिश्तों में यही सबसे बड़ी अड़चन है।

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