पत्रकारिता के जोखिम

बतौर फोटो पत्रकार दानिश सिद्धीकी को जोखिम भरे इलाकों में जाकर काम करने का शौक था। अपने बारह साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल कीं, वे भी कोई मामूली नहीं हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों की पीड़ा को उन्होंने दुनिया के सामने रखा था। इसके लिए ही उन्हें विश्व प्रसिद्ध पुलित्जर सम्मान से नवाजा गया था।

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अफगानिस्तान के कंधार में अफगान बलों के एक मिशन के दौरान दानिश सिद्दीकी। (Credit: Danish Siddiqui/Twitter)

अफगानिस्तान के कंधार प्रांत में भारतीय मीडियाकर्मी दानिश सिद्दीकी की मौत ने वैश्विक मीडिया जगत को हिला कर रख दिया। दानिश रायटर के फोटो पत्रकार थे। वे दो हफ्ते से अफगानिस्तान में थे और जंग की तस्वीरें भेज रहे थे। कंधार के स्पिन बोलदाक जिले में गुरुवार रात अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच संघर्ष में मारे गए दानिश पहले भारतीय मीडियाकर्मी हैं जो अपना काम करते हुए अफगानिस्तान में जारी हिंसा के शिकार हुए हैं। हालांकि युद्ध और हिंसा ग्रस्त इलाकों में काम करने वाले मीडियाकर्मियों को ऐसे खतरों का सामना तो हर पल करना ही पड़ता है।

गृहयुद्ध से जूझ रहे मुल्कों में पत्रकारों पर हमले नई बात नहीं हैं। युद्ध के माहौल में कब कौन किसकी गोली या बम हमले का शिकार हो जाए, कोई नहीं जानता। यह मीडियाकर्मियों का साहस और पेशेवर प्रतिबद्धता ही है कि वे जान जोखिम में डाल कर अनवरत काम करते रहते हैं। बतौर फोटो पत्रकार दानिश सिद्धीकी को जोखिम भरे इलाकों में जाकर काम करने का शौक था। अपने बारह साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल कीं, वे भी कोई मामूली नहीं हैं। रोहिंग्या शरणार्थियों की पीड़ा को उन्होंने दुनिया के सामने रखा था। इसके लिए ही उन्हें विश्व प्रसिद्ध पुलित्जर सम्मान से नवाजा गया था।

अफगानिस्तान में जिस तरह के हालात हैं, उनमें वैसे भी मीडिया से जुड़े लोगों के लिए काम करना जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। तीन महीने पहले तालिबान ने जलालाबाद में रेडियो और टीवी के काम करने वाली तीन महिला पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया था। पिछले दस महीनों में बीस से ज्यादा मीडियाकर्मी तालिबान की गोलियों का शिकार हो चुके हैं। दुनिया में मीडियाकर्मियों के लिए जो सबसे ज्यादा खतरनाक देश माने जाते हैं, अफगानिस्तान भी उनमें से एक है। इस वक्त यहां ज्यादातर इलाकों में अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच भारी जंग चल रही है। तालिबान का दावा है कि उसने देश के पिच्यासी फीसद हिस्से पर कब्जा कर लिया है।

उधर तालिबान के चंगुल से मुल्क को आजाद कराने के लिए अफगान सेना भी पूरी ताकत से लड़ रही है। यह जंग ज्यादा घातक इसलिए भी हो गई है कि लड़ाई का मैदान अब रिहायशी इलाके भी बन गए हैं। ऐसे हालात में सेना के साथ रहते हुए जंग की तस्वीरें लेना और उन्हें दुनिया तक पहुंचाना कितना जोखिम भरा काम है, इसकी कल्पना करना कोई मुश्किल नहीं है।

मीडियाकर्मियों के लिए ऐसे खतरे उनके अपने देश में भी कम नहीं होते। सत्ता की तानाशाही के खिलाफ प्रदर्शनों, भ्रष्टाचार, नागरिक अधिकारों के हनन जैसे मुद्दों पर धरने-प्रदर्शनों के दौरान भी सुरक्षा बल मीडियाकर्मियों को निशाना बनाने से नहीं चूकते। ज्यादा चिंता की बात इसलिए है कि अब लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाले देशों में भी ऐसी प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। पत्रकारों को गैरकानूनी से रूप से बंदी बना लिया जाना, गिरफ्तार कर लेना, उन पर ढेरों मुकदमे ठोक देना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। इसलिए मीडियाकर्मियों की सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। सवाल है कि अगर मीडियाकर्मी सच नहीं दिखाएंगे तो जनता को असलियत पता चलेगी कैसे! आज अफगानिस्तान की हकीकत मीडिया के जरिए ही सामने आ रही है। दानिश सिद्दीकी गोलीबारी में मारे गए। ऐसी मौत का सामना किसी को भी करना पड़ सकता है। पर मीडियाकर्मी स्वतंत्र होकर काम करते रहें, यह तमाम देशों की सरकारों को अभी सुनिश्चित करना होगा।

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