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जमीन की सेहत

खेती योग्य जमीन के बड़े हिस्से के बंजरीकरण का एक बड़ा कारण जीन प्रसंस्कृत बीजों का बड़े पैमाने पर उपयोग है। भारत जैसे देशों में पारंपरिक तरीके से बीजों के प्रसंस्करण किए जाते थे, पर उनसे फसल की पैदावार अधिक नहीं होती थी।

तमाम देशों ने अपनी औद्योगिक नीतियों में पर्यावरणीय नियम-कायदों को काफी लचीला बना दिया है। (Picture by Banka administration)

संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री के संबोधन से एक बार फिर दुनिया का ध्यान जमीन की कमजोर होती सेहत की तरफ गया है। प्रधानमंत्री ने दुनिया के तमाम देशों को आगाह किया कि अगर भूक्षरण और मरुस्थलीकरण को मिल कर रोकने का प्रयास नहीं किया गया, तो इससे आने वाले समय में गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। पर्यावरण और कृषि क्षेत्र में काम करने वाले वैज्ञानिक लंबे समय से इस समस्या की तरफ ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते रहे हैं। मगर विकास परियोजनाओं को दी जाने वाली अंधाधुंध मंजूरी और कृषि उत्पादन बढ़ाने की होड़ में अतार्किक ढंग से रसायनों, उर्वरकों तथा प्रसंस्कृत जीन वाले बीजों के उपयोग पर लगाम लगाने का कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाया जा सका है।

यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि विकास परियोजनाओं के लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई की वजह से भूक्षरण की समस्या बढ़ी है। इससे जमीन के जल सोखने की क्षमता काफी कम हुई है। मगर औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के मकसद से नए कल-कारखानों को मंजूरी देते समय पर्यावरणीय तकाजों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है। तमाम देशों ने अपनी औद्योगिक नीतियों में पर्यावरणीय नियम-कायदों को काफी लचीला बना दिया है। भारत ने भी नए उद्योगों के लिए पर्यावरणीय बाधाओं को काफी हद तक दूर कर दिया है।

खेती योग्य जमीन के बड़े हिस्से के बंजरीकरण का एक बड़ा कारण जीन प्रसंस्कृत बीजों का बड़े पैमाने पर उपयोग है। भारत जैसे देशों में पारंपरिक तरीके से बीजों के प्रसंस्करण किए जाते थे, पर उनसे फसल की पैदावार अधिक नहीं होती थी। इसलिए जीन प्रसंस्कृत बीजों के इस्तेमाल पर जोर दिया गया। इसके लिए भारत में कई कृषि अनुसंधान केंद्र खोले गए, जिनके प्रसंस्कृत बीज भारतीय वातावरण के अनुकूल होते थे। उनसे पैदावार भी अच्छी होती थी। मगर जब विदेशी बीज और उर्वरक कंपनियों के लिए भारत का बाजार खोल दिया गया, तो उन्होंने लगभग पूरे देश की खेती-किसानी पर कब्जा कर लिया।

उनके जीन प्रसंस्कृत बीजों को उगाने के लिए अधिक उर्वरकों और रसायन की जरूरत पड़ती है। यही नहीं, वे पारंपरिक बीजों की अपेक्षा अधिक पानी की मांग करते हैं। जिन खेतों में ये बोए जाते हैं, हर साल उसकी उर्वरता क्षरित होती जाती है। जाहिर है, किसानों को उर्वरकों, रसायनों और पानी की मात्रा बढ़ाती रहनी पड़ती है। इस तरह खेतों का बंजरपन बढ़ रहा है। ऐसे बीजों की बिक्री पर रोक लगाने की मांग लंबे समय से उठती रही है, मगर इस दिशा में कदम नहीं उठाए जा सके हैं।

इसके अलावा हर साल बढ़ते वैश्विक तापमान की वजह से ग्लेशियरों का पिघलना, हरित क्षेत्रों का उजड़ते जाना और मरुस्थल का विस्तार जारी है। इसे रोकने के लिए दुनिया के तमाम देश हर साल अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती का संकल्प तो दोहराते हैं, पर अमेरिका और चीन जैसे विकसित देश इसमें सहयोग के लिए राजी नहीं होते, जो कि सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं।

छिपी बात नहीं है कि विकास परियोजनाओं और उत्पादन पर जोर तथा कार्बन उत्सर्जन में कटौती दोनों पक्षों में संतुलन बनाना बहुत सारे देशों के लिए संभव नहीं हो पा रहा। यह संतुलन न बिठा पाने का ही नतीजा है कि पर्यावरण प्रदूषण का असर बहुत सारी फसलों पर भी पड़ रहा है। नदियों का जल प्रदूषित होने की वजह से खेतों की उर्वरता नष्ट हो रही है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया का दो तिहाई हिस्सा भूक्षरण की समस्या से जूझ रहा है। निस्संदेह इस समस्या से पार पाना है, तो दुनिया के तमाम देशों को इस दिशा में व्यावहारिक पहल करनी होगी।

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