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सच पर बंदिश

सरकार महज दावों के सहारे यह दिखाने की कोशिश में लगी है कि वह कोरोना के खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ रही है। जबकि जमीन पर दशा यह है कि शहरों में तबाही मचाने के बाद कोरोना विषाणु अब राज्य के गांवों का रुख कर चुका है और वहां से भी संक्रमण फैलने की खबरें आने लगी हैं।

यूपी के सीतापुर के बीजेपी विधायक राकेश राठौड़ (फोटोः फेसबुक पेज राकेश राठौड़)

यह छिपा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में कोरोना के संक्रमण से स्थिति बदतर हो चुकी है। बेलगाम होते संक्रमण के बीच मरते लोग और इलाज के मोर्चे पर अस्पतालों से लेकर समूची स्वास्थ्य व्यवस्था की दुर्दशा यह बताने के लिए काफी है कि राज्य में सरकार महामारी से लड़ाई के मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम है।

दूसरी ओर, सरकार महज दावों के सहारे यह दिखाने की कोशिश में लगी है कि वह कोरोना के खिलाफ कारगर लड़ाई लड़ रही है। जबकि जमीन पर दशा यह है कि शहरों में तबाही मचाने के बाद कोरोना विषाणु अब राज्य के गांवों का रुख कर चुका है और वहां से भी संक्रमण फैलने की खबरें आने लगी हैं। आखिर इस स्थिति की जिम्मेदारी किस पर आती है! अफसोसनाक यह है कि अगर कोई व्यक्ति सरकार की लापरवाही और उदासीनता की वजह से पैदा दुर्दशा पर सवाल उठाता है, तो उसकी आवाज को या तो दबाने की कोशिश की जाती है या फिर वह खुद ही कुछ बोलने से पहले सहम जाता है। न केवल विपक्ष, बल्कि राज्य में सत्ताधारी पार्टी के नेता भी अब यह कहने की हालत में आ गए हैं कि अगर वे कुछ बोलेंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में सीतापुर से भाजपा विधायक राकेश राठौर से ट्रॉमा केंद्र को लेकर जब सवाल पूछा गया तो उन्होंने आशंका जताई कि अगर मैं ज्यादा बोलूंगा तो राजद्रोह का मुकदमा लगा दिया जाएगा। इससे पहले उन्होंने साफतौर पर राज्य में कोविड-19 के चलते उपजे हालात से निपटने के तौर-तरीकों पर असंतोष जताया। अगर किसी जनप्रतिनिधि को यह कहने की नौबत आ गई है कि विधायक के लिए अपनी बात सरकार से कहना आसान नहीं रह गया है तो समझा जा सकता है कि आम लोग इस मसले पर क्या कर सकते हैं।

विधायक के कुछ बोलने पर राजद्रोह का मुदकमा होने की आशंका में थोड़ी भी सच्चाई है तो यह पूछने की जरूरत है कि राज्य में लोकतंत्र की हकीकत क्या है! ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब राज्य के अस्पतालों में अव्यवस्था और ऑक्सीजन की कमी से लोगों की जान जा रही थी और जब लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए दूसरों से ऑक्सीजन और अन्य मदद मांगना शुरू कर दिया तब भी सरकार ने कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर उन आवाजों को दबाने की कोशिश की थी।

सवाल है कि अपने कामकाज की शैली में बदलाव और दुर्दशा में पहुंच चुकी स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार करने या व्यवस्थागत ठोस पहलकदमी करने के बजाय सरकार को इस बात से परेशानी क्यों हो रही है कि कोई व्यक्ति या जनप्रतिनिधि उसे आईना दिखा कर हालात में सुधार की मांग कर रहा है! क्या यह नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं है? विडंबना यह है कि एक ओर सरकार के रुख से डरे हुए लोग चुप रहना चुन रहे हैं,

दूसरी ओर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में संक्रमण तेजी से बढ़ने और मरीजों के इलाज में हो रही लापरवाही पर तीखी टिप्पणी की है कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था राम भरोसे चल रही है! आम लोगों के सच बोलने से परेशान सरकार अदालत की इस टिप्पणी पर क्या जवाब देगी! जरूरत इस बात की है कि महामारी की वजह से उपजे इस संकट के दौर में सरकार सच का आईना दिखाने वाले लोगों की बातों पर गौर करके कमियों को दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाए। वरना सच को अगर एक कोने में दबाया जाएगा तो वह किसी और कोने से उभर कर बाहर आ जाएगा।

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