शिक्षा की बुनियाद

देश में शिक्षा की दर बढ़ाने का अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बना रहता है। इसलिए सरकारें समय-समय पर इसके लिए कुछ प्रोत्साहन योजनाएं भी घोषित करती रहती हैं। फिर भी उनसे अपेक्षित परिणाम नहीं निकल पा रहे, तो निश्चित रूप से इसमें कुछ बुनियादी खामियां हैं।

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सांकेतिक फोटो।

खुद केंद्रीय शिक्षामंत्री ने माना है कि देश के करीब पंद्रह करोड़ बच्चे और युवा औपचारिक शिक्षा से वंचित हैं। करीब पच्चीस करोड़ आबादी अब भी साक्षर नहीं हो पाई है। यह स्थिति तब है, जब शिक्षा का अधिकार कानून को लागू हुए ग्यारह साल हो चुके हैं। इस कानून के तहत चौदह साल तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का वादा है। अनिवार्य शिक्षा का तात्पर्य है कि सभी बच्चों को औपचारिक स्कूलों में दाखिला दिलाया जाए।

यह दायित्व सरकारी, निजी और सभी धर्मादा संस्थाओं के तहत चलने वाले स्कूलों पर डाला गया है कि वे इस कानून के तहत बच्चों को शिक्षा प्रदान करें। निजी स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए पच्चीस फीसद सीटें आरक्षित रखना अनिवार्य है। मगर इतने सालों बाद भी अगर पंद्रह करोड़ बच्चे औपचारिक शिक्षा से दूर हैं, तो यह व्यवस्थागत खामियों का ही नतीजा कहा जा सकता है। यों बहुत सारे मां-बाप गरीबी की वजह से अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते, कम उम्र में ही वे उनको किसी कामकाज में लगा देते हैं। इससे पार पाने के मकसद से स्कूलों में दोपहर का भोजन योजना शुरू की गई थी, ताकि बच्चों को पढ़ाई की जगह भोजन के लिए न भटकना पड़े। इसके पीछे उन्हें उचित पोषण उपलब्ध कराने की मंशा भी थी। कई राज्य सरकारों ने ऐसे बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करने के उद्देश्य से कुछ नकदी देने की योजना भी चला रखी है।

देश में शिक्षा की दर बढ़ाने का अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बना रहता है। इसलिए सरकारें समय-समय पर इसके लिए कुछ प्रोत्साहन योजनाएं भी घोषित करती रहती हैं। फिर भी उनसे अपेक्षित परिणाम नहीं निकल पा रहे, तो निश्चित रूप से इसमें कुछ बुनियादी खामियां हैं। गरीब परिवारों के अपने बच्चों को स्कूल न भेजने की वजह पर ही गंभीरता से नजर डालें, तो इसमें केवल भूख उनकी समस्या नहीं है। सरकारी स्कूलों की कमी, उनमें संसाधनों का अभाव और जाति के आधार पर भेदभाव जैसी समस्याएं जड़ जमाए बैठी हैं। आबादी के अनुपात में अब भी पर्याप्त सरकारी स्कूल नहीं हैं। जो स्कूल हैं भी, उनमें अध्यापकों की भर्ती सालों से नहीं हो पाई है। संविदा पर अध्यापक रख कर काम चलाया जाता है। जो अध्यापक हैं, वे स्कूलों में कम ही उपस्थित रहते हैं। कई जगह एक ही अध्यापक सभी कक्षाओं के बच्चों को संभालता पाया जाता है।

ऐसे में जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई का स्तर संतोषजनक नहीं होता। इसलिए भी बहुत सारे माता-पिता के मन में यह धारणा बैठी हुई है कि उनके बच्चों का स्कूल जाना या न जाना बराबर है, इससे अच्छा तो उन्हें कोई काम सीखने में लगा देना है।

वास्तव में शिक्षा का मकसद केवल अक्षर ज्ञान या जोड़-घटाना सीख लेना भर नहीं होता। मगर प्राथमिक स्कूल पास कर चुकने के बावजूद आधे से अधिक बच्चे इतना भर ज्ञान भी अर्जित नहीं कर पाते। आंकड़ों और प्रमाणपत्रों पर उनकी शिक्षा का स्तर बेशक दर्ज हो जाए, पर इससे शिक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं माना जा सकता। सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यही है। मगर सरकारें आंकड़े के लिहाज से जिस तरह शिक्षा का स्तर उठाना चाहती हैं, उसमें भी अनेक ढांचागत खामियों के चलते कामयाबी हासिल नहीं हो पा रही, तो इस पर औपचारिक चिंता प्रकट करने के बजाय उन कमियों को दूर करने के उपायों पर विचार करने की जरूरत है।

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