आंदोलन की राह

असल अड़चन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने को लेकर है। कृषि मंत्री ने कहा कि किसान अपने पांच सदस्यों के नाम दे दें, सरकार एक समिति बना कर एमएसपी के मसले को सुलझाने का प्रयास करेगी। मगर किसान नेताओं को इस तरह की किसी समिति पर भरोसा नहीं है। वे अपने सामने कानून बनता देखना चाहते हैं।

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कयास लगाए जा रहे थे कि किसान संयुक्त मोर्चा की शनिवार की बैठक में घर वापसी को लेकर कुछ फैसला हो सकता है। इसलिए कि कुछ किसान नेता इस पक्ष में थे कि जब उनकी कानून वापसी संबंधी मुख्य मांग मान ली गई है, तो अब उन्हें अपने घर वापस लौट जाना चाहिए। मगर किसान मोर्चा एक कदम आगे बढ़ कर फिर अपनी मांगों को लेकर बैठ गया।

केंद्र सरकार ने किसानों को लंबित मांगों पर बातचीत के लिए न्योता भेजा है। इसके लिए किसान मोर्चा ने पांच सदस्यों की एक समिति बना दी, जो सरकार के साथ बातचीत के लिए जाएगी। अभी वे अपनी मांगों पर कायम हैं। उन्होंने फिर से दोहराया है कि जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून नहीं बनता, किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस नहीं लिए जाते और जान गंवा चुके किसानों को मुआवजे की घोषणा नहीं की जाती, तब तक किसान अपने घर वापस नहीं लौटेंगे। हालांकि तीनों विवादित कृषि कानून वापस लेने के बाद से सरकार का रुख लगातार लचीला बना हुआ है। वह किसानों के साथ बातचीत करन चाहती है। उनकी कई मांगों को उसने अपने आप मान भी लिया है, मसलन पराली जलाने संबंधी मांग।

हालांकि किसान भी लचीला रुख अपनाते दिख रहे हैं, मगर उनकी कुछ नैतिक जवाबदेहियां भी हैं और कुछ रणनीतिक मजबूरियां भी। वे अपने उन साथियों के ऊपर लदे मुकदमे छोड़ कर वापस नहीं जा सकते और न मारे गए किसानों के परिवारों के दर्द को अनदेखा कर सकते, इसलिए इनसे जुड़ी उनकी मांगें समझी जा सकती हैं। ये मांगें ऐसी हैं भी नहीं कि सरकार उनका हल न निकाल सके।

हरियाणा सरकार किसानों पर से मुकदमे हटाने की इच्छा पहले ही जता दी थी, इसे लेकर किसान नेताओं के साथ मुख्यमंत्री की बैठक भी हुई। दूसरे, राज्यों के लिए भी इसे हटाने पर कोई अड़चन नहीं हो सकती। असल अड़चन न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने को लेकर है। कृषि मंत्री ने कहा कि किसान अपने पांच सदस्यों के नाम दे दें, सरकार एक समिति बना कर एमएसपी के मसले को सुलझाने का प्रयास करेगी। मगर किसान नेताओं को इस तरह की किसी समिति पर भरोसा नहीं है। वे अपने सामने कानून बनता देखना चाहते हैं।

मगर सरकार को कुछ लोगों ने समझा दिया है कि एमएसपी पर कानून बन जाने के बाद सरकारी खजाने पर सत्रह लाख करोड़ रुपए से अधिक का बोझ पड़ेगा। जब तक इस भ्रम को दूर नहीं किया जाता और एमएसपी की जरूरत को ठीक से समझाया नहीं जाता, तब तक सरकार के इस दिशा में आगे कदम बढ़ाने की संभावना कम लग रही है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने जिन पांच नेताओं को सरकार से बातचीत के लिए चुना है, वे कृषि क्षेत्र और कानूनी बारीकियों को समझने वाले लोग हैं। हो सकता है, जब वे सरकार के साथ बातचीत के लिए बैठें और दोनों तरफ से इसी लचीले रुख और खुले मन के साथ बातचीत हो तो कई पेचीदगियां सुलझें और कोई सकारात्मक रास्ता खुले।

सरकार भी शायद इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि एमएसपी का मुद्दा सुलझाना किसानों के लिए बहुत जरूरी है। इस सरकार का वादा भी रहा है किसानों की आमदनी दोगुनी करने का। प्रधानमंत्री पहले खुद एमएसपी से संबंधित समिति में शामिल रह चुके हैं। इसलिए उम्मीद की जाती है कि इस मसले पर भी दोनों पक्षों के बीच कोई अच्छी पहल हो सकेगी।

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