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अमन के दुश्मन

अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों का यह दूसरा दल था, जो कश्मीर मामले का अध्ययन करने और अपनी राय देने के मकसद से वहां गया था।

Wreath Ceremony for the Martyrsश्रीनगर के डीपीएल में शुक्रवार को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) मोहम्मद अल्ताफ के पिता उनकी शहादत को पुष्पांजलि देते हुुए। अल्ताफ बडगाम जिले के ज़ीगाम बीरवाह में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में शहीद हो गए थे। ( फोटो- पीटीआई)

जम्मू-कश्मीर में अमन बहाली अलगाववादियों और दहशतगर्दों को रास नहीं आती। जब भी कोई ऐसी पहल होती है जिससे वहां की तरक्की और खुशहाली का रास्ता खुले, तो उसमें खलल डालने की कोशिश वे जरूर करते हैं। इसलिए जब विदेशी राजनयिकों का दल वहां के हालात का जायजा लेने पहुंचा तो आतंकियों ने उनके रहते दो हमले कर डाले। एक तो जहां राजनयिक बैठक कर रहे थे, उसके बिल्कुल करीब एक रेस्तरां मालिक और उसके बेटे को गोली मार कर घायल कर दिया और दूसरा पुलिस गस्ती दल पर घात लगा कर पीछे से हमला किया, जिसमें दो पुलिसकर्मियों की जान चली गई।

उसके बाद शोपियां में सुरक्षाबलों के साथ लश्कर के दहशतगर्दों की मुठभेड़ हुई, जिसमें तीन आतंकी मारे गए। दरअसल, इस तरह के हमले अब आतंकी संगठन अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए अधिक करते देखे जाते हैं। हकीकत यह है कि जबसे अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटा है और घाटी में सुरक्षा इंतजाम कड़े हुए हैं, तबसे उनके युवाओं को गुमराह करके हाथ में हथियार उठाने, विरोध में सड़कों पर उतर कर पत्थरबाजी करने आदि को उकसाने के अभियान पर नकेल कस गई है। बाहर से मिलने वाली अर्थिक मदद भी रुक गई है। मगर बचे-खुचे आतंकी अपनी हैसियत दिखाने के लिए हमले की नाकाम कोशिशें करते रहते हैं।

अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद विदेशी प्रतिनिधियों का यह दूसरा दल था, जो कश्मीर मामले का अध्ययन करने और अपनी राय देने के मकसद से वहां गया था। इस बार गए राजनयिकों के दल ने स्वीकार किया कि अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद घाटी में आतंकी घटनाओं पर रोक लगी है। बेगुनाह नागरिकों के मारे जाने की दर काफी कम हो गई है। अब वहां तेजी से हालात बदल रहे हैं, अमन की सूरत बन रही है। आम अवाम तरक्की के रास्ते खुलने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।

केंद्रीय गृहमंत्री ने भी पिछले दिनों लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा था कि जल्दी ही जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने पर विचार किया जा सकता है। अब वहां रोकी गईं सेवाएं धीरे-धीरे सामान्य होने लगी हैं। जन-जीवन पटरी पर लौटने लगा है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटाने को लेकर पहले जैसे विरोध के स्वर उभर रहे थे, वे काफी कमजोर पड़ गए हैं। जाहिर है, यह सब अलगाववादियों और दहशतगर्दों को खटक रहा है। उनके छिटपुट हमले उसी खीझ का नतीजा हैं।

घाटी में अशांति का बड़ा कारण पाकिस्तान का उस पर दावा रहा है। अलगाववादियों और दहशतगर्द संगठनों को वही उकसाता, भड़काता और घुसपैठ के जरिए सीमा पार भेजता रहा है। मगर जबसे भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी नीयत को बेपर्दा करना शुरू किया और अलगाववादी संगठनों के भारतीय नेताओं को सीखचों के पीछे धकेल दिया, सीमा पार से आने वाली वित्तीय मदद पर कड़ी नजर रखनी शुरू कर दी, व्यापार के कई संदिग्ध रास्ते रोक दिए, तबसे पाकिस्तान की चालें भी काम नहीं आ रहीं।

यही वजह है कि पिछले डेढ़-दो सालों में उसने बेपनाह संघर्ष विराम का उल्लंघन किया और दहशतगर्दों को घुसपैठ कराने की कोशिश की है। मगर सीमाओं पर सख्त निगरानी की वजह से उसमें भी अब उसे पहले की तरह कामयाबी नहीं मिल पाती। इसका असर यह हुआ है कि घाटी में लश्कर, जैश आदि का संजाल छिन्न-भिन्न होता गया है। स्थानीय नागरिकों का समर्थन भी उन्हें नहीं मिल पा रहा। लिहाजा, अपनी झुंझलाहट मिटाने के लिए उनके बचे-खुचे जिहादी हमले करते देखे जाते हैं।

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