संपादकीय: तेजी के उपाय

रिजर्व बैंक को इस बात का भरोसा है कि अगले वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दर साढ़े दस फीसद देखने को मिल सकती है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब बाजारों में मांग निकलने लगी है।

Economyरिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर शक्तिकांत दास। (पीटीआई)

संकट से उबरने में लगी अर्थव्यवस्था को गति देने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में संतुलित रुख अपनाते हुए इस बार भी नीतिगत दरों में कोई बदलाव करने से परहेज किया। मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर चार फीसद और रिवर्स रेपो दर सवा तीन फीसद पर ही बनाए रखी। यह इस बात का संकेत है कि केंद्रीय बैंक अभी कोई जोखिम नहीं लेगा। नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं होने से व्यावसायिक बैंक भी फिलहाल कर्ज सस्ते नहीं करेंगे। हालांकि मौद्रिक समिति ने उदार रुख का संकेत भी दिया है। अगर जरूरत पड़ी तो रेपो और रिवर्स रेपो दरें और नीची लाई जा सकती हैं।

केंद्रीय बैंक का सारा जोर अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के उपायों पर है। इसलिए वह समय-समय पर ऐसे कदम उठाने में नहीं हिचकेगा जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिए बेहद जरूरी हैं। बैंक उन सारे उपायों को आजमाने के पक्ष में हैं जो आर्थिक वृद्धि के सरकार के संकल्पों को पूरा करने में मददगार साबित हो सकें। अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए सरकार ने बजट में जो प्रावधान किए हैं, जो योजनाएं घोषित की हैं, उनके लिए भारी पैसे की जरूरत पड़ेगी और बिना कर्ज लिए इन पर काम हो पाना संभव नहीं है। इसके लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ेगा। ऐसे में बाजार में तरलता सुनिश्चित करना रिजर्व बैंक के लिए बड़ी जिम्मेदारी है।

रिजर्व बैंक को इस बात का भरोसा है कि अगले वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि की दर साढ़े दस फीसद देखने को मिल सकती है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि अब बाजारों में मांग निकलने लगी है। हालांकि मांग, खपत और उत्पादन का चक्र अभी भी गड़बड़ाया हुआ है और इस संकट से निकलने में लंबा वक्त लगेगा। बजट में सरकार ने जिन दीर्घकालिक योजनाओं पर ज्यादा जोर दिया है, उनका मकसद रोजगार और मांग पैदा करना है।

कृषि क्षेत्र में अच्छी विकास दर और संभावनाओं का अनुमान पहले से लगाया जाता रहा है। अब भी माना जा रहा कि कृषि क्षेत्र में संभावनाएं बेहतर हैं और ग्रामीण मांग में मजबूती आएगी। चूंकि देश अब कोरोना के संकट से काफी हद तक बाहर आ चुका है और टीकाकरण अभियान से उपभोक्ताओं का भरोसा फिर से लौटा है। ऐसे में शहरी मांग भी बढ़ेगी। पर इसके लिए जरूरी है कि लोगों के हाथ में पैसा आए। इसलिए रोजगार बढ़ाने वाली योजनाओं को प्राथमिकता देना जरूरी है।

केंद्रीय बैंक की बड़ी चुनौतियों में से एक बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने की भी है। जब व्यावसायिक बैंक मजबूत होंगे तभी कर्ज बाजार जोर पकड़ पाएगा। अभी बैंक एनपीए की समस्या से जूझ रहे हैं। इससे निपटने के लिए सरकार ने बजट में बैड बैंक का प्रस्ताव रखा है। यह बैंक एनपीए संपत्तियों का निपटान करने के लिए बनाया जाना है।

अगर इस प्रयास से बैंकों को एनपीए की समस्या से उबार लिया जाता है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। बाजार में कर्ज का प्रवाह के लिए रिजर्व बैंक ने गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को पैसा देने की वकालत की है। इस वक्त समस्या दोहरी है। बिना कर्ज दिए अर्थव्यवस्था जोर नहीं पकड़ सकती और दूसरी ओर बैंकों व एनबीएफसी के सामने कर्जों के डूबने का खतरा भी बरकरार है। रिजर्व बैंक ने आने वाले दिनों में महंगाई में भी कमी आने का अनुमान व्यक्त किया है। लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि उत्पादन और आपूर्ति की स्थिति क्या रहती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अर्थव्यवस्था जिस दौर से गुजर रही है उसमें हर मोर्चे पर चुनौतियां हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक से सकारात्मक रुख और संतुलित फैसलों की अपेक्षा रहती है।

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