तबाही के मंजर

बारिश अधिक होने पर नदियों में उफान स्वाभाविक है, मगर जबसे बांधों का निर्माण शुरू हुआ है तबसे नदियों की बाढ़ अधिक तबाही का सबब बनती है। शहरों में जलापूर्ति के लिए जहां-जहां पानी रोका जाता है, उसके आगे नदी का प्रवाह मंद पड़ जाता है, उनमें गाद भरनी और टीले बनने शुरू हो जाते हैं। इस तरह उनकी जल संग्रहण क्षमता काफी कम हो जाती है। फिर जब बरसात का पानी अचानक छोड़ा जाता है, तो वह उफन कर शहरों और गांवों को अपनी चपेट में ले लेता है।

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यूपी के प्रयागराज के दारागंज मोहल्ले में गंगा में डूबा आश्रम का ग्राउंड फ्लोर। (फोटो- पीटीआई)

यह सुखद सूचना है कि इस साल बारिश अच्छी हुई है। खरीफ की अच्छी पैदावार होगी। खेती-किसानी में कुछ खुशहाली नजर आएगी। मगर इस बार की बारिश ने जिस तरह अनेक शहरों और गांवों में तबाही मचाई है, उस नुकसान की भरपाई होने में काफी वक्त लगेगा। यह हर साल का सिलसिला बन चुका है कि जरा भी अधिक बारिश होती है, तो शहरों में इस कदर जलभराव हो जाता है कि राहत सामग्री पहुंचाने के लिए प्रशासन को नावों का सहारा लेना पड़ता है। गांव के गांव बह जाते हैं।

इस साल तो कई राज्यों में अनेक नए-पुराने, निर्माणाधीन पुल भी बह गए। इन पुलों के टूटने से किस तरह लोगों का संपर्क भी टूट गया होगा, अपने रोजमर्रा और कारोबारी कामकाज के लिए उन्हें रोज कितनी अतिरिक्त लंबी दूरी तय करनी पड़ती होगी और कितने और साल तक उन्हें यह परेशानी उठानी पड़ेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकारों के पास अब तर्क है कि इस साल बारिश ने पिछले करीब छियालीस सालों का रिकार्ड तोड़ दिया।

यह सही है कि कुदरत के कहर के आगे आदमी विवश होता है, पर हर साल बाढ़ और जलभराव के चलते जिस तरह लोगों को परेशानियों का सामना करना और नुकसान उठाना पड़ता है, उसके लिए केवल कुदरत को जिम्मेदार ठहरा कर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। प्रशासन की नाकामियों के चलते अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। बरसात में जलजमाव की वजहें छिपी नहीं हैं। सामान्य बारिश में भी मुहल्लों और सड़कों पर लंबे समय तक पानी जमा रहना अब एक स्थायी दृश्य बन चुका है। लोग घंटों सड़कों पर फंसे रहते हैं। कई जगह जलनिकासी के लिए बिना सोचे-समझे मैनहोल खोल देने से कई लोग उनमें बह कर दम तोड़ देते हैं।

देर तक पानी जमा रहने से सड़कें धंस और टूट जाती हैं, कई जगह धसक कर मकान बैठ जाते हैं, जिनमें दब कर लोग मारे जाते हैं। इस तरह अब तक करीब पचास लोगों के मारे जाने की सूचना है। इन सबके लिए कुदरत नहीं, प्रशासन जिम्मेदार है। अव्वल तो मुहल्लों की बसावट के समय ही जलनिकासी के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। मगर अनियोजित तरीके से बसते-फैलते शहरों में प्रशासन इस तरफ कभी गंभीरता से ध्यान नहीं देता।

बारिश अधिक होने पर नदियों में उफान स्वाभाविक है, मगर जबसे बांधों का निर्माण शुरू हुआ है तबसे नदियों की बाढ़ अधिक तबाही का सबब बनती है। शहरों में जलापूर्ति के लिए जहां-जहां पानी रोका जाता है, उसके आगे नदी का प्रवाह मंद पड़ जाता है, उनमें गाद भरनी और टीले बनने शुरू हो जाते हैं। इस तरह उनकी जल संग्रहण क्षमता काफी कम हो जाती है। फिर जब बरसात का पानी अचानक छोड़ा जाता है, तो वह उफन कर शहरों और गांवों को अपनी चपेट में ले लेता है।

बांधों का पानी अक्सर तभी छोड़ा जाता है, जब वहां क्षमता से अधिक पानी जमा हो जाता है। इसका प्रबंधन आखिर कौन करेगा। फिर बरसात और बाढ़ का पानी उतरने के बाद गंदगी की वजह से मच्छरों, कीट-पतंगों, विषाणुओं की बढ़वार शुरू हो जाती है। उनसे फैलने वाली बीमारियां प्रशासन के काबू से बाहर हो जाती हैं। मसलन, देश के विभिन्न हिस्सों में फैला डेंगू इन दिनों सरकारों की नाक में दम किए हुए है। सरकारें इन तथ्यों से अनजान नहीं, पर हैरानी कि उन्हें इससे निपटने की कोई व्यावहारिक योजना बनाते नहीं देखा जाता।

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