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विवाद की योजना

अब सरकार को यह सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी है कि राशन वितरक गरीबों के हक के अनाज में छेद न करने पाएं। हर परिवार के हक का पूरा अनाज मिले और गुणवत्तापूर्ण मिले। नगर निगम चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां इस योजना को भी मुद्दा बनाती रही हैं। उन्हें राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठ कर ध्यान रखना होगा कि गरीबों का चूल्हा जलता रहे।

Ration Card | Doorstep Ration Delivery | Delhi News
कोर्ट ने दिल्‍ली सरकार की डोर-टू-डोर राशन योजना पर लगाई रोक (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

गरीबों के लिए चलाई जा रही दिल्ली की राशन वितरण योजना काफी समय से विवाद का विषय बनी हुई थी। दरअसल, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज केंद्र सरकार राज्यों को मुहैया कराती है। हर राज्य को अपने हिस्से का अनाज गोदामों से उठा कर राशन वितरकों तक पहुंचाना होता है। फिर लाभार्थी वितरकों से अपने हिस्से का अनाज लेते हैं।

मगर दिल्ली में काफी लोगों की शिकायत थी कि वितरक गरीबों के हिस्से का अनाज खुले बाजार में बेच देते हैं, जिससे उन्हें पर्याप्त अनाज नहीं मिल पाता या खराब गुणवत्ता का अनाज मिलता है। यह शिकायत लगभग हर राज्य के लोगों की रही है। इसलिए दिल्ली सरकार ने राशन वितरकों के बजाय खुद लोगों को घर-घर राशन पहुंचाने की योजना शुरू कर दी।

इसके पीछे उसका तर्क था कि इस तरह बिचौलिया राशन वितरकों को गड़बड़ी करने का मौका नहीं मिलेगा। दिल्ली सरकार की यह योजना राशन वितरकों को नागवार गुजरी और उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटा दिया। उस पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि अगर दिल्ली सरकार घर-घर चीजें पहुंचाना चाहती है, तो उसे कोई नई योजना शुरू करनी चाहिए। केंद्र द्वारा भेजे गए राशन को वह नहीं पहुंचा सकती। इस तरह मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना को उसने बंद करने का आदेश दिया है।

हालांकि यह कोई पहली योजना नहीं है, जिसे राजनीतिक रंग दिया गया। इस तरह राजनीतिक विवादों में फंस कर अनेक योजनाएं अपने वास्तविक लक्ष्य से अक्सर भटक जाया करती हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार भी कोई छिपी बात नहीं है। हालांकि राशन वितरकों को इसके लिए भुगतान तय है, मगर वे राशन को खुले बाजार में पहुंचाने से बाज नहीं आते।

इसे रोकने के लिए कंप्यूटरीकृत प्रणाली विकसित की गई, पर उसमें भी उन्होंने सेंध लगानी शुरू कर दी। अनेक मौकों पर मारे गए छापों से इसके अनेक प्रमाण मौजूद हैं। इसलिए अगर दिल्ली सरकार ने राशन वितरकों की धोखाधड़ी को रोकने के लिए सीधे लाभार्थियों तक अनाज पहुंचाने की योजना बनाई तो उसके इरादे पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए। मगर इस योजना में भी धोखाधड़ी के आरोप लगने शुरू हो गए थे।

फिर इस योजना का नाम चूंकि मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना है, उससे ऐसा बोध होता था कि जैसे दिल्ली सरकार अपने प्रयास से राशन वितरित कर रही है। केंद्र को इसका श्रेय नहीं मिल पा रहा था। इसलिए इस योजना को राजनीतिक रंग मिलना ही था।

हालांकि अदालत में अपना पक्ष रखते हुए दिल्ली सरकार ने बताया था कि यह योजना केवल दिल्ली सरकार नहीं चला रही, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और कर्नाटक के बंगलुरु में भी घर-घर राशन योजना चल रही है। पर अदालत को यह दलील गले नहीं उतरी और उसने दिल्ली सरकार की राशन वितरण योजना पर विराम लगा दिया।

राशन वितरकों का कहना था कि इस तरह अगर सरकार सीधे लोगों के घर तक राशन पहुंचाने की योजना चलाती रही, तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी। स्वाभाविक ही उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से रहत की सांस ली होगी।

अब सरकार को यह सुनिश्चित कराने की जिम्मेदारी है कि राशन वितरक गरीबों के हक के अनाज में छेद न करने पाएं। हर परिवार के हक का पूरा अनाज मिले और गुणवत्तापूर्ण मिले। नगर निगम चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां इस योजना को भी मुद्दा बनाती रही हैं। उन्हें राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठ कर ध्यान रखना होगा कि गरीबों का चूल्हा जलता रहे।

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