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धोखे का टीका

हर जगह चल रहे टीकाकरण अभियान का फायदा उठा कर मुंबई में एक गिरोह ने वहां की एक रिहाइशी सोसाइटी में रहने वालों को अपने जाल में फंसाया और बहुत सारे लोगों को ऐसा टीका लगाया, जिसके बारे में यह निश्चित नहीं है कि उसमें कौन-से तत्त्व थे।

टीकाकरण के नाम पर मुंबई की एक सोसाइटी में जो कुछ हुआ, वह मानवीय निरंकुशता की हद है। (File/Amit Chakravarty)

किसी भी आपदा के समय यह उम्मीद की जाती है कि लोग एक दूसरे की मदद इस रूप में करेंगे कि सबके लिए संकट से बाहर निकलना संभव हो सके। लेकिन यह बेहद अफसोस की बात है कि ऐसे समय में भी कुछ लोग मानवीय संवेदना को ताक पर रख कर दूसरों से ठगी और यहां तक कि पीड़ितों की जान से खिलवाड़ करने से नहीं हिचकते हैं। फिलहाल समूचे देश में कोरोना विषाणु के संक्रमण से बचाव के लिए सबसे कारगर उपाय के तौर पर टीकाकरण अभियान चल रहा है।

सरकार अलग-अलग स्वरूप में इसे संचालित कर रही है और बहुत सारे लोग उसका लाभ उठा भी रहे हैं। जाहिर है, इसके पीछे लोगों के भीतर अपने जीवन को बचाने की भूख है। लेकिन इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि कुछ लोग इसी मौके को अपने लिए गलत तरीके से कमाई करने का जरिया बना लें। मुंबई में ऐसा ही मामला सामने आया है जिसमें हर जगह चल रहे टीकाकरण अभियान का फायदा उठा कर एक गिरोह ने वहां की एक रिहाइशी सोसाइटी में रहने वालों को अपने जाल में फंसाया और बहुत सारे लोगों को ऐसा टीका लगाया, जिसके बारे में यह निश्चित नहीं है कि उसमें कौन-से तत्त्व थे।

गौरतलब है कि इस दुश्चक्र में फिल्म उद्योग से जुड़ी कंपनियां भी फंस गईं, जिनके कई सौ कर्मचारियों ने भी इस तरह टीका लगवा लिया। इसके लिए बाकायदा लोगों से टीके की कीमत भी वसूली गई। लेकिन जब प्रमाण-पत्र मिलने का मामला सामने आया और कुछ लोगों को इसके असर को लेकर शक हुआ, तब जाकर इसका खुलासा हुआ कि काफी लोग ठगे गए हैं। निश्चित तौर पर यह एक गंभीर आपराधिक गतिविधि है, जिसमें इस बात का खयाल रखना तक जरूरी नहीं समझा गया कि इस धोखे से लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है।

यों पुलिस ने इस मामले के पांच आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है कि फर्जी तरीके से सैकड़ों लोगों को टीका लगाने वाले अपना काम करते रहे और पुलिस या प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। जबकि टीकाकरण की किसी भी गतिविधि के लिए स्थानीय प्रशासन की आधिकारिक अनुमति से लेकर प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम का होना जरूरी है। लेकिन फर्जी तरीके से टीका लगाने का यह काम सार्वजनिक रूप से चलता रहा और किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया।

यह किसी से छिपा नहीं है कि शरीर में अगर किसी अवांछित रसायन का प्रवेश हो जाए तो उसके दुष्प्रभावों से लेकर मौत होने तक का खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन इस बात का खयाल किए बिना महज कुछ पैसे कमाने या ठगी करने के लिए इतनी बड़ी तादाद में लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया। कोरोना संक्रमण के खतरों से निपटने के क्रम में यह पहला मौका नहीं है जब कुछ आम लोगों के भय और जीवन बचाने की भूख का शोषण करने की कोशिश की गई। इससे पहले भी दूसरी लहर के चरम के दौर में ऑक्सीजन सिलिंडर और कुछ दवाइयों की कालाबाजारी की खबरें आईं थीं।

एक ओर इनके अभाव में लोग दम तोड़ रहे थे और दूसरी ओर कुछ संवेदनहीन कारोबारी इसके लिए बेलगाम कीमत वसूल रहे थे। यहां तक कि जीवनरक्षक बताई जाने वाली दवाइयों की नकली खुराक भी बड़े पैमाने पर बेची गई। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि एक ओर हमारे समाज में आपदा और व्यापक संकट के दौर में भी आपराधिक मानसिकता के लोग मुनाफा कमाने और मजबूर लोगों की लूट-खसोट करने में लग जाते हैं, दूसरी ओर सरकारें भी ऐसी गतिविधियों को पूरी तरह रोक पाने में लापरवाही बरतती हैं।

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