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नेपाल में गतिरोध

दरअसल, नेपाल में उभरे ताजा राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि पिछले साल दिसंबर में ही तैयार हो गई थी जब प्रधानमंत्री ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई और संसद को भंग करने का फैसला लिया।

नेपाल में राजनीतिक गतिरोध और अस्थिरता को कोई कारगर हल नहीं दिख रहा है।

सोमवार को नेपाल की संसद में मौजूदा सरकार ने अपने बचे रहने के लिए एक आखिरी कोशिश जरूर की, लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान वहां जो राजनीतिक तस्वीर बनी थी, उसमें यह पहले से तय लग रहा था कि क्या होना है। इसका संकेत साफ होने के बावजूद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने संसद में विश्वासमत का सामना किया और नतीजे वही सामने आए, जिसका अंदाजा शायद उन्हें भी रहा होगा।

गौरतलब है कि नेपाल की संसद में कुल दो सौ इकहत्तर सदस्य हैं, जिसमें सरकार बचाने के लिए कम से कम एक सौ छत्तीस सदस्यों के समर्थन की जरूरत थी। रविवार के घटनाक्रम से कुछ देर के लिए जरूर ऐसा लगा था कि सदस्यों से संपर्क अभियान और जोड़तोड़ के जरिए ओली अपनी सत्ता बचा लेंगे। लेकिन ओली के पक्ष में सिर्फ तिरानबे सदस्यों ने मतदान किया, जबकि विरोध में एक सौ चौबीस ने। पंद्रह सांसद तटस्थ रहे। यानी पिछले कुछ समय से लगातार चल रही इस मशक्कत का अंत हो गया कि नेपाल की मौजूदा सरकार ही अगले चुनाव तक के लिए काम करे। अब मजबूरन ओली को इस्तीफा देना होगा। हालांकि अगली सरकार बनने तक के लिए शायद वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहें।

दरअसल, नेपाल में उभरे ताजा राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि पिछले साल दिसंबर में ही तैयार हो गई थी जब प्रधानमंत्री ओली ने मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई और संसद को भंग करने का फैसला लिया। उनके फैसले को आनन-फानन में राष्ट्रपति ने मंजूरी भी दे दी और मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर डाली। तब सहयोगी दलों के साथ-साथ विपक्ष ने भी इसे एकतरफा और मनमाना बताया था। इसके अलावा, वहां इस मसले पर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे। सबसे अहम यह कि संविधान विशेषज्ञों ने भी यह सवाल उठाया था कि नेपाल के संविधान में संसद को भंग करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

इसकी पुष्टि फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश से हुई, जिसमें उसने संसद की भंग की गई प्रतिनिधि सभा को बहाल करने को कहा। यह ओली के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि शुरू में ही संसद भंग करने के उनके फैसले के पीछे एक कारण यह माना गया था कि संसदीय दल, केंद्रीय समिति और पार्टी सचिवालय में ओली अपना बहुमत खो चुके हैं। ऐसी स्थिति में सत्ता की कमान पर उनकी पकड़ धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही थी।

इस लिहाज से देखें तो संसद में विश्वासमत में उनकी हार ने एक तरह से उसी समीकरण और आकलन की पुष्टि की है। सवाल यह है कि पिछले करीब तीन साल से कमोबेश सामान्य गति से कामकाज करने के बाद वे कौन-से हालात पैदा हुए जिनके चलते ओली के सामने अचानक संसद को भंग करने की सिफारिश करने की नौबत आ गई थी! राजतंत्र के खात्मे और लोकतंत्र की बहाली के बाद नेपाल लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजरा है। मगर मौजूदा सरकार के बनने के बाद यह उम्मीद जगी थी कि नेपाल की राजनीति अब एक स्थिर शक्ल अख्तियार कर रही है।

सच यह है कि नेपाल सरकार के गठन में शामिल प्रमुख सहयोगी दलों के भीतर पर्दे के पीछे लगातार खींचतान चल रही थी। ऐसे में सत्ता में बने रहने के लिए शक्ति संतुलन को लंबे समय तक साधे रखना एक मुश्किल काम था। बहरहाल, काफी जद्दोजहद के बाद अब तस्वीर साफ हो गई है। आगे देखना यह है कि प्रधानमंत्री ओली के विरोध में मत देने वाले सदस्यों और समूहों के बीच सरकार बनाने के लिए क्या कोई नया समीकरण बनता है! अगर ऐसा नहीं हो सका तो आखिरकार नेपाल एक और चुनाव की ओर ही बढ़ेगा।

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