संकट का सामना

ऐसा नहीं कि पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों से रिजर्व बैंक परेशान नहीं है। वह खुद मान रहा है कि इन दोनों उत्पादों के दाम बढ़ने से जो महंगाई बढ़ रही है, उससे आमजन का जीना मुहाल हो गया है।

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भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास। (एक्सप्रेस फोटो: प्रशांत नाडकर, फाइल)


रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने इस बार भी नीतिगत दरों में बदलाव नहीं किया। यह लगातार आठवां मौका है जब रेपो और रिवर्स रेपो दर को पूर्वस्तर पर रखा गया है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केंद्रीय बैंक अभी दरों में उदार रुख बनाए रखने के पक्ष में है। नीतिगत दरें 2001 के बाद से सबसे निचले स्तर पर बनी हुई हैं। अभी रेपो दर चार फीसद और रिवर्स रेपो दर 3.35 फीसद है। हालांकि दरों को बहुत लंबे समय तक इतने न्यूनतम स्तर बनाए रखना भी संभव नहीं है।

मौद्रिक नीति समिति ने यह संकेत भी दे दिया है कि आने वाले दिनों में वह उन प्रोत्साहन उपायों को वापस लेने का भी काम शुरू कर सकती है जो महामारी से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए किए गए थे। जाहिर है, अगली बैठक में नीतिगत दरों में वृद्धि को लेकर कोई राय बने। फिलहाल रेपो और रिवर्स रेपो दर बदलाव नहीं करने का फैसला इसलिए भी लिया गया है ताकि बैंक कर्ज कम ब्याज दरों पर ही मिलते रहें। त्योहारी मौसम में लोग घर, गाड़ी और कई तरह का सामान खरीदते हैं और इससे बाजार में तेजी का रुख बनता है। अगर कर्ज सस्ते रहेंगे तो बाजार में मांग बनाने में मदद मिलेगी।
पिछले बीस महीनों में रिजर्व बैंक का जोर महामारी से ध्वस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में रहा है।

इसके लिए बैंक ने कई बड़े कदम उठाए, उद्योगों को राहत दी, बैंकों को नगदी मुहैया करवाई, खासतौर से छोटे और मझौले उद्योगों के लिए कर्ज सस्ता किया ताकि पूर्णबंदी के कारण बंद हो चुके उद्योग फिर से काम शुरू कर सकें। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक की चिंता महंगाई को लेकर भी कम नहीं दिखी। महंगाई बेकाबू होने की वजह से भी नीतिगत दरों में वृद्धि करना संकट को और बढ़ाना ही होता। हालांकि अर्थव्यवस्था में अब सुधार के संकेत दिखने लगे हैं। लेकिन अभी भी सबसे बड़ा संकट मांग और उत्पादन का बना हुआ है।

रिजर्व बैंक खुद मान रहा है कि उत्पादन अभी भी महामारी के पहले वाली स्थिति में नहीं आया है। इसके साथ बाजारों में मांग भी नहीं है। मांग और उत्पादन में सुस्ती छाई रहना चिंता पैदा करता है। अभी भी जो लोग खरीद कर रहे हैं, वे बहुत जरूरी होने पर ही पैसा निकाल रहे हैं। यानी लोगों के पास पैसे का संकट अभी भी है। इसलिए रिजर्व बैंक के सामने बड़ी चुनौती मांग, उत्पादन और खपत के चक्र को फिर से चलाने की है।

महंगाई भी चिंता का बड़ा कारण बनी हुई है। रिजर्व बैंक का अनुमान है कि अगले साल मार्च तक मुख्य मुद्रास्फीति 5.3 फीसद रहेगी, जिसका पहले 5.7 फीसद रहने का अनुमान था। यानी आने वाले वक्त में भी महंगाई से राहत मिलने के आसार नहीं लग रहे। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के लगातार बढ़ते दाम आग में घी का काम कर रहे हैं। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने से हर चीज महंगी होती जा रही है।

ऐसा नहीं कि पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों से रिजर्व बैंक परेशान नहीं है। वह खुद मान रहा है कि इन दोनों उत्पादों के दाम बढ़ने से जो महंगाई बढ़ रही है, उससे आमजन का जीना मुहाल हो गया है। इन दोनों उत्पादों पर शुल्कों में कटौती के लिए वह केंद्र से कह भी चुका है। लेकिन केंद्र और राज्य इस मुद्दे पर जिस तरह की चुप्पी साधे हुए हैं, वह संकट को दिनोंदिन गंभीर ही बना रही है।

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