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संकट और सबक

देश में स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा किस कदर बदहाल है, यह अब छिपा नहीं रह गया है। देश की बात तो दूर, राजधानी दिल्ली जहां दो-दो सत्ताएं हैं, संसद है, अदालतें हैं, विदेशी दूतावास हैं, अमीरों और सत्तावानों का बड़ा तबका है, वहां स्वास्थ्य सेवाएं चौपट हाल में हैं।

दिल्ली के एक श्मशान घाट में कोरोना मरीजों के शवों के पास खड़ा एक शख्स। (PTI Photo)

स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर हालत पर सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों का चिंतित होना वाजिब है। अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से मरीजों के दम तोड़ने की घटनाओं ने रोंगटे खड़े कर डाले। इस अराजक स्थिति से विचलित सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों ने केंद्र और राज्य सरकारों को कसा है। सरकार की लचर व्यवस्था से खिन्न पटना हाई कोर्ट ने तो राज्य सरकार को यहां तक कह दिया कि अगर उससे काम नहीं हो रहा है तो फिर सेना को सौंप दे। सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट की सख्ती का इतना असर तो दिखने लगा कि दिल्ली को उसकी मांग के अनुरूप ऑक्सीजन मिलने लगी।

दूसरे राज्यों को भी ऑक्सीजन देने के लिए केंद्र ने कदम उठाने शुरू किए। लेकिन राज्यों को उनकी मांग के मुताबिक ऑक्सीजन की आपूर्ति अभी भी बड़ी समस्या बनी हुई है। दिल्ली जैसे हालात कर्नाटक में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कर्नाटक का ऑक्सीजन कोटा बढ़ा कर बारह सौ मीट्रिक करने और उसे इतनी ऑक्सीजन मुहैया कराने को कहा है। अस्पतालों को ऑक्सीजन आपूर्ति पर अदालतों का रुख सख्त है। ऑक्सीजन आबंटन पर केंद्र की कोटा व्यवस्था कितनी खामियों भरी है, यह अब सामने आ गया है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि राज्य ऑक्सीजन के लिए तरस रहे हैं और केंद्र आबंटन नीति, ऑक्सीजन ऑडिट जैसे तर्कों से अपने बचाव में लगा है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं का बुनियादी ढांचा किस कदर बदहाल है, यह अब छिपा नहीं रह गया है। देश की बात तो दूर, राजधानी दिल्ली जहां दो-दो सत्ताएं हैं, संसद है, अदालतें हैं, विदेशी दूतावास हैं, अमीरों और सत्तावानों का बड़ा तबका है, वहां स्वास्थ्य सेवाएं चौपट हाल में हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने तो कहा भी कि यहां स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा चरमरा गया है और सरकार शुतुरमुर्ग की तरह बर्ताव कर रही है। अगर हाई कोर्ट को ऐसी सख्त टिप्पणी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है तो निश्चित ही इसके कारण हैं।

पिछले एक पखवाड़े में कई नामी-गिरामी अस्पतालों ने असलियत को उजागर करके रख दिया। अस्पतालों में समय से ऑक्सीजन संयंत्र नहीं लग पाए, जबकि इस काम के लिए केंद्र पहले ही मंजूरी देने का दावा कर रहा है। क्या इस बात की गहराई से जांच नहीं होनी चाहिए कि अस्पतालों में निर्धारित समय में ऑक्सीजन संयंत्र क्यों नहीं लग पाए? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? सवाल यह है कि जब विशेषज्ञ दूसरी लहर के खतरे को लेकर पहले से चेताते रहे थे तो फिर सरकारें सोती क्यों रहीं?

अब तीसरी लहर का खतरा भी सामने है। विशेषज्ञों ने अभी से आगाह कर दिया है। ज्यादा चिंता की बात यह है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए ज्यादा घातक बताई जा रही है। ऐसे में सरकारों को अभी से ठोस बंदोबस्त करने की जरूरत है। अब तक का अनुभव बताता है कि महामारी से लड़ने के मामले में केंद्र और राज्य सरकारों में तालमेल की भारी कमी रही है। चाहे टीकाकरण का मसला हो या राज्यों को जरूरी मदद और ऑक्सीजन आबंटन का मामला, राज्य केंद्र पर भेदभाव करने का आरोप लगाते रहे हैं। शायद इसीलिए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा भी था कि एक राज्य को उसके आबंटित कोटे से ज्यादा ऑक्सीजन दी गई और दिल्ली को कम, आखिर क्यों? केंद्र और राज्य सरकारों को समझना चाहिए कि यह वक्तएक दूसरे पर आरोप लगाने, नीचा दिखाने या राजनीतिक लाभ उठाने का नहीं है। देश के हर नागरिक का जीवन अमूल्य है। और इसकी रक्षा तभी हो सकती है कि जब राजनीति से ऊपर उठ कर और एकजुट होकर काम किया जाएगा।

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