ताज़ा खबर
 

संपादकीय: राहत के बावजूद

अगर बचाव के घोषित उपायों पर सही तरीके से अमल जारी रहा तो उम्मीद की जानी चाहिए कि देश जल्दी ही इस खतरे से पार निकल कर फिर से विकास की सामान्य रफ्तार पकड़ लेगा।

corona vaccinationगुरुग्राम में एक पुलिसकर्मी को कोविड-19 का टीका लगाती महिला चिकित्सक। (फोटो-पीटीआई)

पिछले साल मार्च में कोरोना संक्रमण की रोकथाम के मद्देनजर लागू की गई पूर्णबंदी के बाद से अब तक देश इस महामारी और इसके असर से उबर नहीं सका है। लेकिन इस बीच इसका सामना करने और इससे निपटने के लिए जितने भी इंतजाम किए गए, सावधानियां बरती गईं, उसका फायदा जरूर मिला है। वरना शुरुआती दौर में जितने बड़े पैमाने पर महामारी की मार की आशंका जताई जा रही थी, उसके मुकाबले हमारे देश में इसका असर काफी कम देखा गया। इसकी मुख्य वजह यह रही कि समय रहते सरकार ने अपने स्तर पर बचाव से लेकर इलाज तक के मोर्चे पर ठोस कदम उठाए, जहां जरूरत हुई वहां सख्ती की गई।

नतीजतन, इसके संक्रमण की दर को काफी कम किया जा सका। इसके अलावा, एक पहलू यह भी रहा कि हमारे देश की आबोहवा, आम जनजीवन में खानपान और जीवनशैली के बीच आम लोगों के भीतर कुछ अपने स्तर पर अर्जित रोग प्रतिरोधक क्षमता ने भी कोरोना की मार की तीव्रता को सीमित रखा। यही वजह रही कि डर और वास्तविक खतरे के बावजूद आज देश महामारी के सामने एक ऐसी स्थिति में पहुंच सका है, जहां राहत की सांस ली जा सकती है।

इसके समांतर हकीकत यह है कि अगर ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ जैसे सामान्य संदेशों का खयाल नहीं रखा गया तो हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि इसके खमियाजे क्या हो सकते हैं। यह भारत सहित दुनिया भर के देशों ने देखा है और आज भी इससे पूरी तरह उबरना एक बड़ी चुनौती है। लेकिन इस बीच कोरोना के संक्रमण की स्थिति और उसके प्रसार पर नजर रखने के लिए कराए गए सीरो सर्वेक्षण से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि इस विषाणु से बहुत सारे लोग संक्रमित हुए और उससे पार भी पा गए।

गुरुवार को आइसीएमआर यानी भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के महानिदेशक ने पिछले साल सात दिसंबर से आठ जनवरी के बीच कराए गए तीसरे राष्ट्रीय सीरो सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर बताया कि अब तक अठारह वर्ष और इससे ज्यादा उम्र के 28,589 लोगों में से करीब इक्कीस फीसद में पूर्व में कोरोना विषाणु की चपेट में आने का पता चला। जबकि दस से सत्रह वर्ष की आयु के लगभग पच्चीस फीसद बच्चों में भी इसकी पुष्टि हुई। सर्वेक्षण जिस अवधि में किया गया, उस दौरान टीकाकरण की शुरुआत नहीं हुई थी।

जाहिर है, इस सर्वेक्षण के नतीजे चिकित्सकीय उपायों के समांतर यह संकेत भी देते हैं कि देश में एक बड़ी आबादी ऐसी है जो कोरोना विषाणु से संक्रमित हुई और उससे उबर गई। यानी बहुत सारे लोगों के भीतर इस विषाणु से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। इस महामारी को जिस स्तर के खतरे के रूप में देखा जा रहा है, उसमें भारत में अगर लोगों के भीतर खुद ही इससे लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता तैयार हो रही है तो यह एक बड़ी राहत की बात है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अभी भी करीब सत्तर फीसद लोग इसके संक्रमण के खतरे के सामने हैं और अगर जरूरी सावधानी नहीं बरती गई तो स्थिति कभी भी फिर नियंत्रण से बाहर जा सकती है।

पिछले साल भर के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इससे बचाव के लिए समय-समय पर हाथ धोने, मास्क लगाने और एक दूसरे से उचित दूरी बनाने जैसे उपायों की वजह से हालात में सुधार हो रहा है। अगर बचाव के घोषित उपायों पर सही तरीके से अमल जारी रहा तो उम्मीद की जानी चाहिए कि देश जल्दी ही इस खतरे से पार निकल कर फिर से विकास की सामान्य रफ्तार पकड़ लेगा।

Next Stories
1 संपादकीय: टकराव का रास्ता
2 संपादकीय: सियासत की खेती
3 संपादकीय: चीन को चेतावनी
ये पढ़ा क्या?
X