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खतरे पर असमजंस!

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस आशंका को बेबुनियाद बताया है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए ज्यादा घातक होगी। कारण यह कि इस बारे में कोई ठोस वैज्ञानिक संकेत नहीं मिले।

कोरोना की तीसरी लहर के बच्चों पर प्रभाव को लेकर अभी कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है।

अचानक यह खबर आना राहत की बात है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए खतरनाक नहीं होगी। दरअसल, जब से इस बारे में चेतावनियां आने लगीं, तब से ही राज्यों से लेकर अभिभावकों तक की नींद उड़ी हुई है। ऐसा होना लाजिमी भी है। बच्चों के साथ स्थितियां गंभीर रूप धारण करते देर भी नहीं लगती। दूसरी लहर का कहर तो हम भुगत ही रहे हैं। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि हालात इतने बदतर हो जाएंगे। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा का मामला और गंभीर हो जाता है। पर अब नए तथ्य सामने आए हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस आशंका को बेबुनियाद बताया है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए ज्यादा घातक होगी। कारण यह कि इस बारे में कोई ठोस वैज्ञानिक संकेत नहीं मिले। जबकि कुछ दिन पहले ही केंद्र सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन और केंद्र्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बाकायदा चेतावनी दी थी कि तीसरी लहर बच्चों के लिए सबसे खतरनाक होगी। यहां तक कहा गया था कि इसमें करीब पचास फीसद मरीज बच्चे हो सकते हैं। ऐसी ही चेतावनियां देश-विदेश के महामारी विशेषज्ञ भी देते रहे। इन चेतावनियों के साथ ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों को सतर्क करते हुए एहतियाती कदम उठाने को भी कहा था। इसलिए ज्यादातर राज्यों ने इस खतरे से निपटने की तैयारियां शुरू कर दीं। कुछ राज्यों ने बाल कोविड केंद्र्र और विशेष कार्य बल आदि का बना लिए हैं।

महामारी के पूरे परिदृश्य को देखें तो विषाणु के नए-नए रूप ज्यादा जानलेवा साबित हो रहे हैं। कुल मिला कर ऐसी जटिल स्थिति बन गई कि किसी को कुछ नहीं सूझ रहा। वैज्ञानिक और चिकित्सक खुद हैरान हैं। कभी लग रहा है कि तीसरी लहर बच्चों के लिए घातक होगी, कभी लग रहा है नहीं होगी। हालांकि ऐसा खतरा नहीं मानने का आधार पहली और दूसरी लहर के आंकड़े ही हैं। अभी तक बच्चों के संक्रमण के जो मामले आए भी, वे गंभीर नहीं थे। जबकि पिछले एक महीने में बच्चों में संक्रमण के मामले कुछ तो बढ़े हैं। इनमें शिशुओं से लेकर किशोरवय तक के बच्चे हैं। एक और तर्क दिया जा रहा है।

वह यह कि विषाणु जिस रिसेप्टर के जरिए कोशिका से जुड़ता है, वह बच्चों में कम होता है। इसलिए बच्चों को ज्यादा खतरा नहीं होगा। वैसे यह विस्तृत अध्ययन और शोध के विषय हैं। इनमें लंबा वक्त लगता है। जब तक देश के हर जिले, तहसील और गांव तक से पूरे और सही आंकड़े नहीं मिलते, तब तक कोई विश्वसनीय निष्कर्ष निकाल पाना संभव नहीं है।

दरअसल महामारी के विस्फोट ने सबको हिला डाला है। बस जैसे-तैसे मरीजों की जान बच जाए, यही कोशिश दिखती है। तीसरी लहर का कहर कब और कैसा होगा, कोई नहीं जानता। विषाणु के स्वरूप से लेकर महामारी के इलाज तक पर चिकित्सक और वैज्ञानिक उलझन में हैं। प्रधानमंत्री ने विषाणु को बहरूपिया और धूर्त की संज्ञा दी है। पता नहीं किस रूप में कब कहां हमला कर दे। ऐसी असमंजस की सूरत में रास्ता यही है कि कई मोर्चों पर तैयारी रखी जाए। लिहाजा हमें यह मान कर नहीं बैठ जाना चाहिए कि तीसरी लहर बच्चों के लिए कम घातक होगी। बल्कि यह मानते हुए कि अगली लहर और जानलेवा हो सकती है, राज्यों को युद्धस्तर पर अपनी तैयारियां जारी रखनी चाहिए।

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