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मजबूरी का फायदा

सवाल है कि इंसानियत और मनुष्य की संवेदनशीलता में इस स्तर की छीजन आखिर कैसे आई? ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि एक संवेदनशील समाज के तौर पर विकास के क्रम में कहीं बड़ी चूक हुई है।

कर्नाटक के बेंगलुरू में सुम्मनहल्ली श्मशान के बाहर लगी एंबुलेंस की कतार। (फोटोः पीटीआई)

दुख और संकट से घिरे इंसान की मदद करने से ज्यादा बड़ी पूजा कुछ और नहीं हो सकती। लेकिन इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि एंबुलेस चालक जान बचाने की भूख में अस्पताल पहुंचाने की गुहार लगाते लोगों से उनकी मजबूरी का फायदा उठाने की कोशिश करें। पिछले कुछ दिनों से कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच गंभीर हालत में मरीजों को अस्पताल जाने की जरूरत पड़ रही है। एक ओर अस्पतालों में बिस्तर की कमी, तो दूसरी ओर वहां भी पहुंचना सिर्फ इसलिए दुष्कर हो रहा है कि या तो सड़कों पर वाहन उपलब्ध नहीं हैं या फिर एंबुलेंस वाले मनमाने पैसे मांग रहे हैं। समाज में किसी की मौत के बाद लोग हर तरह से मदद के लिए खुद ही खड़े हो जाते हैं। लेकिन आज हालत यह है कि कोरोना से अगर किसी की मौत हो जाए तो उसके शव को श्मशान पहुंचाने के मामले में भी कुछ एंबुलेंस चालक संवेदनहीनता दिखा रहे हैं। हाल में दिल्ली और देश के कई हिस्सों से ऐसी खबरें आर्इं, जिनमें यह बताया गया कि एंबुलेंस चालकों ने कहीं अस्पताल पहुंचाने या फिर शव को श्मशान ले जाने के लिए बेलगाम पैसे मांगे।

इस तरह की लगातार खबरें आने के बाद कुछ राज्यों में सख्ती की गई और निर्धारित जगहों और दूरी के लिए एंबुलेंस का किराया तय कर दिया गया। लेकिन यह अपने आप में हैरान करने वाली बात है कि संकट में पड़े लोगों की मदद करने के बजाय उनकी मजबूरी का फायदा उठा कर ज्यादा से ज्यादा कमाई की जाए। इसलिए सरकार और पुलिस की ओर से कहीं-कहीं सख्ती से एंबुलेंस का किराया तय करने की पहल सही है, लेकिन यह भी सोचने की जरूरत है कि ऐसे समय में सरकार की अपनी व्यवस्था क्या है!

अव्वल तो सरकारी अस्पतालों में बुनियादी संसाधनों का अभाव, दूसरे सेवा में जोखिम की वजह से लोगों को वहां जाने के लिए अतिरिक्त हिम्मत जुटानी पड़ती है। जबकि देश भर में सरकारी स्वास्थ्य तंत्र इतना व्यापक है कि सारी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद की जा सकती हैं। मगर लापरवाही और उदासीनता की वजह से आज हालत यह है कि सरकारी व्यवस्था में कमी का बेजा फायदा निजी अस्पताल से लेकर एंबुलेंसों के मालिक उठा रहे हैं।

सवाल है कि इंसानियत और मनुष्य की संवेदनशीलता में इस स्तर की छीजन आखिर कैसे आई? ऐसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि एक संवेदनशील समाज के तौर पर विकास के क्रम में कहीं बड़ी चूक हुई है। हालांकि यह भी सच है कि इसी समाज में वे लोग भी हैं, जिन्होंने बिना किसी लोभ के अपने संसाधनों के जरिए जितना संभव हो सका, जरूरतमंदों की मदद की। एक ओर कुछ शहरों से एंबुलेंस वालों की मनमानी कीमतें वसूलने की खबरें आ रही हैं तो दूसरी ओर ऐसे उदाहरण भी हैं, जिनमें लोगों ने अपने निजी वाहन को एंबुलेंस बना दिया या इसी तरह के प्रयास सामूहिक रूप से भी हुए।

भोपाल के एक व्यक्ति ने अपने आॅटो को एंबुलेंस की शक्ल दी, उसमें ऑक्सीजन की व्यवस्था भी की और वह मरीजों को बिना पैसे लिए अस्पताल पहुंचाता है। अपने आॅटो को एंबुलेंस में तब्दील करने के लिए पैसों का इंतजाम उसने अपनी पत्नी के जेवर बेच कर किए। इस तरह के और भी उदाहरण सामने आए हैं, जब कोरोना की वजह से हुई मौत के चलते अगर किसी के दाह संस्कार में नाते-रिश्तेदार पीछे हट गए तो आस-पड़ोस के और दूसरे धर्म के लोगों ने आगे बढ़ कर हर तरह से मदद की। इंसानियत और संवेदना के बचे होने और बचने की उम्मीद ऐसे ही लोगों से बनती है।

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