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चुनौतियों के बीच

अभी तक देखने में यह आया है कि व्यावसायिक बैंक के रुख के कारण नीतिगत दरों में कमी का फायदा लोगों तक पहुंच नहीं रहा है। आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी है कि उद्योगों को तत्काल मदद दी जाए।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटोः पीटीआई)

रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने इस बार भी नीतिगत दरों में बदलाव नहीं कर उदार रुख का संकेत दिया है। यह लगातार छठा मौका है जब रेपो दर चार और रिवर्स रेपो दर साढ़े तीन फीसद पर ही रखी गई है। इस वक्त केंद्रीय बैंक के सामने बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की है। साथ ही महंगाई को भी काबू में रखना है। जाहिर है, ऐसे में ज्यादा जोखिम नहीं लिए जा सकते। महामारी की दूसरी लहर के कारण ज्यादातर राज्यों में डेढ़ महीने की बंदी से कारोबारी और औद्योगिक गतिविधियां एक बार फिर प्रभावित हो हुई हैं। दो महीने पहले ही मौद्रिक नीति समिति ने आर्थिक वृद्धि को गति देने के लिए जो कदम उठाए थे, उन्हें इससे धक्का लगा है। इसलिए मौद्रिक समिति को आर्थिक वृद्धि का अनुमान साढ़े दस से घटा कर साढ़े नौ फीसद करना पड़ा है। ऐसे में अर्थव्यवस्था में तेजी लाना कम चुनौती भरा काम नहीं है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि कारोबारी गतिविधियों को पटरी पर लाने के लिए कई क्षेत्रों को मदद की दरकार है। केंद्रीय बैंक ने इस जमीनी हकीकत को बूझा है। इसीलिए बैंक ने इस बार ज्यादा ध्यान पर्यटन कारोबार और इससे जुड़े क्षेत्रों को खड़ा करने पर दिया है। रिजर्व बैंक ने उड्डयन क्षेत्र से जुड़ी बुनियादी सेवाएं देने वालों, यात्राएं आयोजित करने वाले एजेंटों, किराए पर वाहन देने वालों, आयोजन कराने वाली कंपनियों, आपूर्ति शृंखला से जुड़ी सेवाओं, ब्यूटी पार्लर, जिम व स्पा आदि चलाने वालों को रेपो दर पर ही तीन साल के लिए कर्ज देने का एलान किया है। इसके लिए केंद्रीय बैंक पंद्रह हजार करोड़ रुपए जारी करेगा। इसके अलावा लघु उद्योग विकास बैंक को भी सोलह हजार करोड़ रुपए दिए जाएंगे, ताकि वह छोटे उद्योगों को कर्ज दे सके।

केंद्रीय बैंक की यह पहल आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकती है। लेकिन इसके लिए व्यावसायिक बैंकों को रुचि लेनी होगी और साथ ही थोड़ा जोखिम भी उठाना पड़ेगा। अभी तक देखने में यह आया है कि व्यावसायिक बैंक के रुख के कारण नीतिगत दरों में कमी का फायदा लोगों तक पहुंच नहीं रहा है। आर्थिक वृद्धि का लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी है कि उद्योगों को तत्काल मदद दी जाए।

गौरतलब है कि बढ़ती महंगाई ने भी सबके पसीने छुड़ा रखे हैं। चालू वित्त वर्ष में खुदरा महंगाई 5.1 फीसद रहने का अनुमान है। महंगाई का रुख काफी कुछ मानसून पर भी निर्भर करेगा। इसके अलावा कच्चे माल की कमी, उत्पादन और आपूर्ति के हालात से सरकार कैसे निपटती है, इससे भी महंगाई की दशा-दिशा तय होनी है। हालांकि पेट्रोल और डीजल के दाम जिस तरह आसमान छू रहे हैं, उससे तो लगता नहीं कि महंगाई थमेगी। पिछले कुछ महीनों में खाने के तेलों से लेकर अंडे, दालें, मांस आदि के दाम डेढ़ गुने से भी ज्यादा बढ़े हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिंसों के भाव भी उछाल पर हैं और भारत के घरेलू पर इसका असर न पड़े, ऐसा संभव नहीं है। दूसरी ओर, रसायन, कागज, कपड़ा क्षेत्र आदि में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी महंगा होता जा रहा है। जाहिर है, उत्पाद भी महंगे होंगे। और महंगाई की मद में बढ़ने वाली एक-एक पाई आम आदमी की जेब से ही निकलेगी। इन हालात में महंगाई को चार फीसद के दायरे में रखना केंद्रीय बैंक के लिए आसान तो नहीं होगा। संकट से निपटने के लिए रिजर्व बैंक के प्रयासों में कमी नहीं है। देखने की बात बस यह है कि ये कोशिशें कितनी कामयाब होती हैं।

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