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परीक्षा की परीक्षा

अगर बारहवीं की परीक्षाएं और टलीं तो इससे विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।प्रतियोगी परीक्षाएं भी बारहवीं की परीक्षाओं के बाद ही होनी हैं, ऐसे में उनके आयोजन को लेकर भी अधरझूल की स्थिति बनी रहेगी। इस बार विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए भी संयुक्त प्रवेश परीक्षा कराने पर विचार हो रहा है।

संशोधित शेड्यूल अभी तक बोर्ड द्वारा घोषित नहीं किया गया है। – प्रतीकात्मक फोटो (फोटो -The Indian Express)

महामारी के बीच केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की बारहवीं की परीक्षाएं कराने को लेकर सरकार में मंथन जारी है। इस मुद्दे पर रविवार को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें राज्यों से सुझाव मांगे गए। हालांकि बैठक बेनतीजा ही रही। पर महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ज्यादातर राज्य परीक्षा अब और नहीं टालने के पक्ष में नजर आए। विद्यार्थियों के भविष्य को देखते हुए राज्य भी चाहते हैं कि परीक्षाएं जल्द निपट जाएं।

अब देखने की बात यह बची है कि परीक्षाएं कैसे और कब शुरू होती हैं। बारहवीं की परीक्षाएं इसलिए भी ज्यादा जरूरी हैं, क्योंकि बिना इनके नतीजों के कॉलेजों या अन्य पाठ्यक्रमों में दाखिले नहीं हो सकेंगे। बारहवीं के बाद परीक्षार्थियों को इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए प्रवेश परीक्षा भी देनी है। ऐसे में अगर बारहवीं की परीक्षाएं और टलीं तो इससे विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। क्योंकि प्रतियोगी परीक्षाएं भी बारहवीं की परीक्षाओं के बाद ही होनी हैं, ऐसे में उनके आयोजन को लेकर भी अधरझूल की स्थिति बनी रहेगी। उधर, इस बार विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए भी संयुक्त प्रवेश परीक्षा कराने पर विचार चल रहा है। ऐसे में बारहवीं की परीक्षा करवाना अपरिहार्य हो गया है।

गौरतलब है कि महामारी की दूसरी लहर के कारण पिछले महीने बोर्ड की परीक्षाएं टाली गई थीं। तब वाकई ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि परीक्षाएं करवाना विद्यार्थियों की जान जोखिम में डालने जैसा होता। लेकिन महामारी का संकट अभी खत्म हुआ नहीं माना जा सकता। हां, इतना जरूर है कि कुछ राज्यों में अब संक्रमण की दर गिरने लगी है। उम्मीद है कि दो-तीन हफ्तों में स्थिति इतनी तो ठीक हो जाएगी कि परीक्षाएं करवाई जा सकें। ज्यादातर विद्यार्थी और अभिभावक भी चाहते हैं कि परीक्षाएं हो जाएं तो तनाव खत्म हो। परीक्षा होगी या नहीं होगी, या क्या वैकल्पिक रास्ता निकलेगा, इसे लेकर विद्यार्थियों में भारी तनाव पैदा हो जाता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। वे साल भर मेहनत करते हैं और ऐसी उहापोह की स्थिति उनकी मेहनत पर पानी फेर देने के लिए काफी होती है।

हालांकि जो राज्य परीक्षा नहीं कराने के पक्ष में हैं, उनकी चिंताओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ा खतरा तो संक्रमण का ही है। अगर बड़ी संख्या में परीक्षार्थी बाहर निकले तो संक्रमण के खतरे को टाला नहीं जा सकता। ऊपर से अठारह साल से ज्यादा वालों के टीकाकरण को लेकर जो मुश्किलें आ रही हैं, वे जगजाहिर हैं। राज्यों के पास टीके ही नहीं हैं। ऐसे विद्यार्थियों की तादाद भी कम नहीं हैं जो अठारह साल से ऊपर के हैं। इसलिए दिल्ली, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्य पहले टीकाकरण और फिर परीक्षा के पक्ष में हैं। कुछ राज्यों ने बताया भी है कि वे कैसे इस महाभियान को पूरा कर सकते हैं।

सीबीएसई की परीक्षाएं दो चरणों में हो सकती हैं, सब विषयों की नहीं होकर कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों की हो सकती हैं और परीक्षा का स्वरूप बहुविकल्प प्रश्नों का हो सकता है। ऐसे ही कई विकल्पों पर विमर्श चालू है। राज्यों को अपने हिसाब से छूट दी जा सकती है। छत्तीसगढ़ ने तो अनूठा मॉडल बनाया है जिसमें विद्यार्थी परीक्षा केंद्र से प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका घर ले जाएं और पांच दिन में करके जमा करवा दें। महाराष्ट्र सरकार ऑनलाइन परीक्षा की वकालत कर रही है। इस बात में तो कोई विवाद हो ही नहीं सकता है कि विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोपरि है। उन्हें संक्रमण से बचाना है। और इस तरह यह परीक्षा केंद्र और राज्य सरकारों की भी परीक्षा है।

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